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बंद कमरे में दर्ज बयान के बाद FIR: अविमुक्तेश्वरानंद पर POCSO एक्ट के तहत मामला, अदालत ने दिए निष्पक्ष जांच के आदेश

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Avimukteshwaranand POCSO case: नाबालिग बच्चों के कथित यौन शोषण के गंभीर आरोपों के चलते धर्मगुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ पास्को (POCSO) एक्ट के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज की गई है। यह कार्रवाई प्रयागराज की विशेष अदालत के स्पष्ट निर्देश पर हुई। अदालत ने मामले को गंभीर श्रेणी का अपराध मानते हुए पुलिस को तत्काल FIR दर्ज कर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करने का सख्त आदेश दिया है।

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अदालत के आदेश पर दर्ज हुई प्राथमिकी

मामला उस समय तूल पकड़ गया जब बच्चों के अभिभावक के रूप में आशुतोष ब्रह्मचारी नामक व्यक्ति ने न्यायालय की शरण ली। विशेष अदालत में दो नाबालिगों के बयान दर्ज कराए गए। प्राप्त जानकारी के अनुसार, विशेष जज ने बंद कमरे में बच्चों के बयान रिकॉर्ड किए। प्रथमदृष्टया आरोपों को गंभीर मानते हुए संबंधित थाने को POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज करने का निर्देश दिया गया।

अदालत के आदेश के बाद झूंसी थाने में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, उनके एक शिष्य और दो-तीन अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। थाना प्रभारी ने पुष्टि की है कि मामला न्यायालय के आदेश पर पंजीकृत हुआ है और अब विधिक प्रक्रिया के तहत जांच आगे बढ़ाई जाएगी।

आरोपों की प्रकृति

दर्ज FIR में आरोप लगाया गया है कि नाबालिग शिष्यों के साथ कथित रूप से यौन शोषण किया गया। शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि कथित घटनाएं पिछले कुछ वर्षों से चल रही थीं और हाल के एक धार्मिक आयोजन के दौरान भी बच्चों के साथ अनुचित कृत्य किए जाने का आरोप है। बच्चों ने अदालत के समक्ष स्वयं को असुरक्षित बताते हुए संरक्षण और न्याय की मांग की।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरोप संगीन प्रकृति के हैं और इन्हें केवल निजी शिकायत के रूप में सीमित नहीं रखा जा सकता। तथ्यों की पुष्टि और साक्ष्यों के संकलन के लिए पुलिस जांच आवश्यक है।

POCSO अधिनियम के प्रावधान

POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) अधिनियम के तहत नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों को कठोर दंड के दायरे में रखा गया है। दोष सिद्ध होने की स्थिति में आरोपी को सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। साथ ही, पीड़ित की पहचान और गरिमा की रक्षा करना कानूनन अनिवार्य है।

अदालत ने जांच एजेंसी को निर्देश दिया है कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष ढंग से संपन्न की जाए तथा पीड़ितों की पहचान गोपनीय रखी जाए। जांच रिपोर्ट निर्धारित समयसीमा में न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और कानूनी दृष्टिकोण

मामले के सामने आने के बाद प्रदेश में राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। कुछ पक्षों ने इसे राजनीतिक साजिश बताया है, जबकि अन्य ने सरकार की भूमिका पर प्रश्न उठाए हैं। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि प्राथमिकी अदालत के आदेश पर दर्ज की गई है, इसलिए इसे प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक निर्णय नहीं कहा जा सकता।

कानून के जानकारों का मत है कि किसी भी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष ठहराने का अधिकार केवल न्यायालय को है। फिलहाल मामला जांच के चरण में है और अंतिम निर्णय साक्ष्यों के आधार पर अदालत द्वारा ही लिया जाएगा।

धार्मिक प्रतिष्ठा पर प्रभाव

उत्तर प्रदेश में यह मामला इसलिए भी संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि आरोप एक प्रमुख धार्मिक पद पर आसीन व्यक्ति पर लगे हैं। सोशल मीडिया पर इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखी जा रही हैं। कुछ लोग इसे धार्मिक छवि पर आघात बता रहे हैं, जबकि अन्य निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में भावनाओं से परे रहकर न्यायिक प्रक्रिया पर विश्वास रखना आवश्यक है। यदि आरोप असत्य सिद्ध होते हैं तो संबंधित व्यक्ति को न्याय मिलेगा, और यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

आगे की प्रक्रिया

अब मामले की दिशा पुलिस जांच पर निर्भर करेगी। बयान, मेडिकल रिपोर्ट, डिजिटल साक्ष्य और अन्य उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया जाएगा। पर्याप्त साक्ष्य मिलने की स्थिति में आरोपपत्र दाखिल किया जाएगा और मामला ट्रायल के लिए अग्रसारित होगा।

अदालत के आदेश के बाद दर्ज इस प्राथमिकी ने धार्मिक और सामाजिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। फिलहाल सभी की नजरें जांच की प्रगति और आगामी न्यायिक कार्यवाही पर टिकी हुई हैं।

Shivam Verma
Author: Shivam Verma

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