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Hamirpur News: आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की मांगों को लेकर प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन, उपजिलाधिकारी राठ को सौंपा गया पत्र

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Hamirpur News: देश की बुनियाद को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं आज अपने ही भविष्य को लेकर असुरक्षा की स्थिति में हैं। वर्ष 1975 से नौनिहालों के पोषण, प्रारंभिक शिक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संभाल रहीं ये महिला कर्मी आज भी बेहद कम मानदेय, सामाजिक सुरक्षा के अभाव और प्रशासनिक उपेक्षा का सामना कर रही हैं।

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इन्हीं समस्याओं और लंबित मांगों को लेकर जनपद हमीरपुर के सरीला, गोहांड और राठ क्षेत्र की आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं एवं सहायिकाओं ने प्रधानमंत्री को संबोधित ज्ञापन उपजिलाधिकारी राठ को सौंपा। महिला कर्मियों का कहना है कि देशहित में निरंतर कार्य करने के बावजूद न तो उनका वर्तमान सुरक्षित है और न ही भविष्य। यह विडंबना है कि जिन हाथों में देश के भविष्य को गढ़ने की जिम्मेदारी है, वही हाथ आज सम्मानजनक अधिकारों से वंचित हैं।

अल्प मानदेय और सामाजिक सुरक्षा का अभाव

वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मात्र 4500 रुपये प्रतिमाह और सहायिकाओं को 2200 रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जा रहा है। यह राशि न तो बढ़ती महंगाई के अनुरूप है और न ही न्यूनतम मजदूरी के आसपास। कुछ राज्यों में राज्य सरकारें अतिरिक्त मानदेय देती हैं, लेकिन केंद्र स्तर पर मानदेय में संशोधन पांच वर्षों में केवल एक बार किया जाता है।

आंगनबाड़ी कर्मियों को महंगाई भत्ता, वार्षिक वेतन वृद्धि, पेंशन, भविष्य निधि, ग्रेच्युटी और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। इसके बावजूद इन्हें आज भी मानसेवी बताकर नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया गया है, जबकि चयन प्रक्रिया, योग्यता, सेवा शर्तें, अनुशासनात्मक कार्रवाई और सेवानिवृत्ति से जुड़े सभी नियम केंद्र सरकार द्वारा ही निर्धारित किए जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी ठंडे बस्ते में

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति आंगनबाड़ी कर्मियों को स्थायी नौकरी से वंचित रखने की एक सुनियोजित नीति का परिणाम है। 25 अप्रैल 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिकाएं ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम के अंतर्गत ग्रेच्युटी पाने की हकदार हैं। लगभग तीन वर्ष बीत जाने के बावजूद यह आदेश देश में कहीं लागू नहीं किया गया, जिसे सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना माना जा रहा है।

इसके अलावा सिविल अपील संख्या 3153 में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि आंगनबाड़ी कर्मी न तो स्वयंसेवी हैं और न ही मानसेवी, बल्कि सरकार की प्रत्यक्ष कर्मचारी हैं। न्यायालय ने उन्हें नियमित कर स्थायी नौकरी, वेतनमान, भत्ते और सामाजिक सुरक्षा देने की बात कही थी, लेकिन जमीनी स्तर पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

देशभर में लाखों कर्मी, फिर भी उपेक्षा

देश में वर्तमान में लगभग 28 लाख आंगनबाड़ी महिला कर्मी कार्यरत हैं। समान कार्य करने वाले कई संविदा कर्मियों को राज्य सरकारों द्वारा नियमित किया जा चुका है, लेकिन आंगनबाड़ी कर्मियों को अब तक इस दायरे से बाहर रखा गया है। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत इन्हें नर्सरी शिक्षक के रूप में समायोजित कर नियमित करने का विकल्प भी मौजूद है, लेकिन इस दिशा में कोई निर्णायक कदम नहीं उठाया गया है।

मार्च 2019 में मानदेय में वृद्धि की गई थी, लेकिन उसके बाद लगातार महंगाई बढ़ती रही। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में भारी इजाफा हुआ, सरकारी कर्मचारियों का महंगाई भत्ता बढ़ा और न्यूनतम मजदूरी में भी संशोधन हुआ, जबकि आंगनबाड़ी कर्मियों का मानदेय वर्षों से जस का तस बना हुआ है। कर्मियों की मांग है कि केंद्र सरकार अपने अंशदान में तीन गुना वृद्धि करे, ताकि राज्य अंशदान के साथ मानदेय 20 हजार से 25 हजार रुपये प्रतिमाह तक पहुंच सके।

भयमुक्त और शोषण रहित कार्य वातावरण की मांग

आंगनबाड़ी कर्मियों का आरोप है कि उन्हें आए दिन मानसिक दबाव, धमकी, जबरन डिजिटल कार्य और अनावश्यक नियमों के जरिए प्रताड़ित किया जाता है। फेस रिकॉग्निशन प्रणाली को कई स्थानों पर अपमानजनक और अव्यवहारिक बताया जा रहा है। ज्ञापन के माध्यम से मांग की गई है कि गुजरात हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार सरकारी कर्मचारी का दर्जा और वेतन श्रेणी लागू की जाए, मानदेय 800 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से 24 हजार रुपये प्रतिमाह किया जाए और फेस रिकॉग्निशन प्रणाली को तत्काल बंद किया जाए।

इसके साथ ही टीएचआर वितरण पुराने नियमों के अनुसार करने, सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार ग्रेच्युटी भुगतान, पोषण आहार की मात्रा तीन गुना बढ़ाने, पोषण ट्रैकर के लिए 5जी मोबाइल और सालाना 5000 रुपये रिचार्ज भत्ता देने तथा सेवानिवृत्ति पर 5 लाख रुपये की सहायता और पेंशन सुविधा लागू करने की मांग भी उठाई गई।

आंगनबाड़ी कर्मियों के पक्ष में लिया गया कोई भी ठोस निर्णय न केवल महिला सशक्तिकरण, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों की वास्तविक कसौटी साबित होगा। अब सवाल यह है कि सरकार कब तक इन महिला कर्मियों की अनदेखी करती रहेगी और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का वास्तविक पालन कब होगा। देश का भविष्य संवारने वाली इन महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा देना अब समय की मांग बन चुका है।

रिपोर्ट– प्रतीक तिवारी

Shivam Verma
Author: Shivam Verma

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