Lucknow News: सचिवालय (लाल बहादुर शास्त्री भवन) स्थित एनेक्सी प्रेस रूम पर ताला लगाए जाने के फैसले ने राजधानी के पत्रकारों में गहरा असंतोष पैदा कर दिया है। इस मुद्दे पर नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स इंडिया (NUJI) की उत्तर प्रदेश इकाई ने मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया है और प्रेस रूम को तत्काल खोलने की मांग की है।
चार दशक पुरानी सुविधा पर लगा ताला
एनयूजेआई के राष्ट्रीय संगठन मंत्री प्रमोद गोस्वामी और प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सक्सेना ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि वर्ष 1980 में एनेक्सी भवन के निर्माण के साथ ही पत्रकारों की सुविधा के लिए प्रेस रूम, प्रेस वार्ता हॉल और कंप्यूटर रूम की व्यवस्था की गई थी। समय-समय पर सरकार द्वारा इन सुविधाओं का आधुनिकीकरण भी कराया गया, ताकि समाचार संकलन की प्रक्रिया सुचारु रूप से चल सके।
“चंद लोगों के विवाद की सजा सभी को क्यों?”
पत्रकारों ने प्रशासन के इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए इसे अनुचित बताया है। उनका कहना है कि कुछ गुटों के बीच हुए विवाद को आधार बनाकर पूरे प्रेस रूम को बंद करना तर्कसंगत नहीं है। पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह प्रेस रूम किसी एक समूह की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सभी पत्रकारों के उपयोग के लिए एक सार्वजनिक सुविधा है।
प्रमोद गोस्वामी और वीरेंद्र सक्सेना ने सरकार से अपील करते हुए कहा कि “चंद लोगों के विवाद की सजा सभी पत्रकारों को देना न्यायसंगत नहीं है।” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि एनेक्सी में आने वाले पत्रकार अपने पेशेवर दायित्वों के निर्वहन के लिए इन सुविधाओं पर निर्भर रहते हैं।
एनयूजेआई ने रखीं प्रमुख मांगें
यूनियन ने अपने पत्र के माध्यम से सरकार और प्रशासन के सामने स्पष्ट मांगें रखी हैं। इनमें सबसे प्रमुख मांग प्रेस रूम को तत्काल खोलने की है, ताकि इसकी गरिमा और उपयोगिता बनी रहे। साथ ही यह भी कहा गया है कि एनेक्सी में कार्यरत पत्रकारों को समाचार संकलन के दौरान किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
इसके अलावा यूनियन ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाद करने वाले पक्षों पर आवश्यक कार्रवाई करना अलग बात है, लेकिन सार्वजनिक सुविधा को बंद करना एक गलत परंपरा को बढ़ावा देता है, जिसे तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए।
फील्ड रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर असर
प्रेस रूम बंद होने का सबसे अधिक असर उन पत्रकारों पर पड़ा है जो फील्ड पर काम करते हैं और जिनका इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे पत्रकारों को अब बैठने और अपने कार्यों को व्यवस्थित तरीके से पूरा करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अब निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह पत्रकारों की मांगों पर क्या निर्णय लेता है।
Author: Shivam Verma
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