Lucknow News: राज्यसभा सांसद एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व उप मुख्यमंत्री डॉ दिनेश शर्मा ने धार्मिक शिक्षा से जुड़े मुद्दे पर हिंदू शिक्षण संस्थानों को अल्पसंख्यक संस्थानों के समान अधिकार दिए जाने की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में किसी प्रकार का भेदभाव उचित नहीं है।
राज्यसभा के शून्य काल में अपनी बात रखते हुए डॉ शर्मा ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में एक असंतुलन देखने को मिलता है। उनके अनुसार, अल्पसंख्यक संस्थानों को सरकारी सहायता प्राप्त होने के बावजूद अपने संस्थानों में धार्मिक शिक्षा देने की अनुमति है, जबकि हिंदू संस्थानों को ऐसा करने से रोका जाता है। उन्होंने इस अंतर को समाप्त करते हुए सभी संस्थानों को समान स्वायत्तता देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के कारण शिक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक असमानता उत्पन्न हो गई है। अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनमें धार्मिक शिक्षा देने का अधिकार प्राप्त है, जबकि हिंदू संस्थान इस अधिकार से व्यावहारिक रूप से वंचित हैं। इसके अलावा, शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत अल्पसंख्यक संस्थानों को छूट मिलती है, जबकि हिंदू संस्थानों पर यह नियम प्रशासनिक और आर्थिक बोझ के रूप में लागू होता है।
डॉ शर्मा ने उदाहरण देते हुए कहा कि सरकारी हस्तक्षेप से बचने के लिए रामकृष्ण मिशन ने अपने स्कूलों को अल्पसंख्यक दर्जा दिलाने का प्रयास किया था, जो सफल नहीं हो सका। इसी प्रकार आर्य समाज द्वारा संचालित डीएवी संस्थानों और कर्नाटक के लिंगायत समुदाय द्वारा संचालित संस्थानों ने भी ऐसे प्रयास किए, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।
उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक ग्रंथों की शिक्षा के मामले में भी असंतुलन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनके अनुसार, सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों में कुरान और मिशनरी संस्थानों में बाइबिल की शिक्षा दी जा सकती है, जबकि हिंदू संस्थानों को वेद या गीता पढ़ाने पर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आपत्ति का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से सरकारी सहायता प्राप्त हिंदू संस्थानों को इस प्रकार की शिक्षा देने से रोका जाता है।
डॉ शर्मा ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि सभी के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने से जुड़ा हुआ है। उन्होंने सुझाव दिया कि “एक देश, एक विधान” की भावना के तहत अनुच्छेद 29 और 30 में संशोधन कर अल्पसंख्यक शब्द के स्थान पर सभी नागरिकों को शामिल किया जाए, ताकि धार्मिक शिक्षा के अधिकार सभी को समान रूप से मिल सकें।
उन्होंने अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि इस मांग को हिंदू-मुस्लिम दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इसमें किसी के अधिकार छीनने की बात नहीं है, बल्कि समानता स्थापित करने की बात है। राज्यसभा में इस विषय को उठाए जाने के दौरान 17 अन्य सांसदों ने भी उनके विचारों का समर्थन किया और सदन में करतल ध्वनि के साथ इस प्रस्ताव का स्वागत किया।
Author: Shivam Verma
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