भारत में अल्पसंख्यक की परिभाषा, उनके अधिकारों और संवैधानिक स्थिति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बीच हाल ही में हुई तीखी बयानबाजी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। विवाद की जड़ मुस्लिम समुदाय की आबादी, अल्पसंख्यक दर्जे और संविधान के तहत मिलने वाले अधिकारों को लेकर दिए गए बयान हैं।
रिजिजू के बयान से शुरू हुआ विवाद
एक सम्मेलन के दौरान केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भारत में मुस्लिम आबादी की तुलना पारसी समुदाय से करते हुए कहा कि यदि भारत के मुसलमानों को एक अलग देश माना जाए तो वह दुनिया का छठा सबसे बड़ा देश हो सकता है। उन्होंने कहा कि दूसरी ओर लगभग 52,000 की आबादी वाला पारसी समुदाय एक छोटे कस्बे या गांव के बराबर है, लेकिन इसके बावजूद दोनों समुदायों को देश में अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त है।
रिजिजू ने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों को सरकार से बहुसंख्यक हिंदू समुदाय की तुलना में अधिक सहायता और योजनाओं का लाभ मिलता है। उन्होंने कहा, “हिंदुओं को जो कुछ मिलता है वह अल्पसंख्यकों को भी मिलता है, लेकिन जो अल्पसंख्यकों को मिलता है वह हिंदुओं को नहीं मिलता।”
ओवैसी का पलटवार
रिजिजू के बयान पर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर हिंदू और मुस्लिम आबादी के प्रतिशत का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि “79.8% बड़ा है या 14%?”
ओवैसी ने कहा कि यदि हिंदू देश में बहुसंख्यक समुदाय हैं तो हर गैर-हिंदू समुदाय स्वाभाविक रूप से अल्पसंख्यक माना जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्रीय मंत्री मुसलमानों को संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकारों से वंचित करने के लिए दुष्प्रचार कर रहे हैं।
रिजिजू का जवाब
ओवैसी की प्रतिक्रिया के बाद किरेन रिजिजू ने भी पलटवार किया। उन्होंने ओवैसी को भारत में मुसलमानों का सबसे बड़ा नेता बताते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा और कहा कि कांग्रेस अब “मुस्लिम लीग पार्टी” बन चुकी है।
रिजिजू ने यह भी कहा कि भारत में सभी धर्मों ने विकास किया है, लेकिन प्रतिशत के हिसाब से केवल हिंदुओं और पारसियों की आबादी में कमी आई है।
संविधान में अल्पसंख्यकों के लिए क्या प्रावधान हैं?
भारत का संविधान अल्पसंख्यकों को कई महत्वपूर्ण अधिकार और संरक्षण प्रदान करता है, लेकिन दिलचस्प तथ्य यह है कि संविधान में कहीं भी “अल्पसंख्यक” शब्द की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है।
संविधान का अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा की गारंटी देता है। वहीं अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका संचालन करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। संविधान निर्माताओं ने अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करने की जिम्मेदारी कार्यपालिका पर छोड़ दी थी।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 का प्रावधान
वैधानिक रूप से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 केंद्र सरकार को किसी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने का अधिकार देता है। वर्तमान में देश में छह धार्मिक समुदायों को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त है। इनमें मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन समुदाय शामिल हैं।
इन समुदायों को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं, छात्रवृत्तियों और वक्फ संरक्षण जैसी सुविधाओं का लाभ मिलता है।
राज्यवार अल्पसंख्यक दर्जे की मांग भी तेज
पिछले कुछ वर्षों में यह मांग लगातार उठती रही है कि अल्पसंख्यक दर्जा राष्ट्रीय स्तर के बजाय राज्य-वार तय किया जाए। दक्षिणपंथी विचारकों का तर्क है कि जिन राज्यों में मुसलमान बहुसंख्यक हैं, वहां उन्हें केंद्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक नहीं माना जाना चाहिए।
2011 की जनगणना के अनुसार कुछ राज्यों में हिंदुओं की स्थिति
2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश के कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हिंदू आबादी अल्पसंख्यक स्थिति में है।
लक्षद्वीप में हिंदुओं की आबादी 2.5 प्रतिशत है।
मिजोरम में 2.75 प्रतिशत।
नागालैंड में 8.75 प्रतिशत।
मेघालय में 11.53 प्रतिशत।
जम्मू और कश्मीर में 28.44 प्रतिशत।
अरुणाचल प्रदेश में 29 प्रतिशत।
मणिपुर में 31.39 प्रतिशत।
पंजाब में 38.40 प्रतिशत।
Author: Shivam Verma
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