World News: अमेरिका में होने वाले मिडटर्म चुनावों में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, जिससे राजनीतिक प्रचार का पूरा तौर-तरीका ही बदल गया है. राजनीतिक दल और उनसे जुड़े संगठन अब ऐसे हाई-टेक वीडियो और विज्ञापन तैयार करवा रहे हैं, जिन्हें देखकर आसानी से यह पहचान पाना मुश्किल हो जाता है कि क्या सच है और क्या झूठ. इस तकनीक की मदद से विरोधी नेताओं को ऐसी हरकतें करते हुए या ऐसी बातें बोलते हुए दिखाया जा रहा है, जो उन्होंने कभी वास्तव में की ही नहीं थीं. इस बड़े बदलाव का खुलासा वेस्लेयन मीडिया प्रोजेक्ट के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया विश्लेषण में सामने आया है, जिसमें विज्ञापनों के खर्च और उनके बनाने के तरीकों पर गहराई से नजर डाली गई है.
सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, चुनावी विज्ञापनों में एआई के इस्तेमाल पर करीब 13.7 करोड़ डॉलर यानी भारतीय मुद्रा में लगभग 1,200 से 1,300 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं. हैरान करने वाली बात यह है कि इस तकनीक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल रिपब्लिकन पार्टी और उससे जुड़े समूहों द्वारा किया गया है, जिनकी हिस्सेदारी लगभग 81 फीसदी रही है. इसके मुकाबले डेमोक्रेटिक पार्टी इस मामले में काफी पीछे नजर आई और उनकी हिस्सेदारी महज 12 फीसदी के आसपास ही सिमट कर रह गई. इस भारी-भरकम खर्च से साफ जाहिर होता है कि अमेरिकी राजनीति में एआई अब केवल एक नया प्रयोग नहीं, बल्कि एक बेहद ताकतवर और मुख्यधारा का हथियार बन चुका है.
एआई के इस दौर में अब केवल साधारण तस्वीरें या लिखित स्क्रिप्ट बनाने का काम नहीं हो रहा है, बल्कि नेताओं के चेहरे के हाव-भाव और उनकी आवाज की सटीक नकल करके डीपफेक वीडियो बनाए जा रहे हैं. उदाहरण के लिए, न्यूयॉर्क के एक चुनावी कैंपेन में मेयर और गवर्नर को एक काल्पनिक दवा का प्रचार करते हुए दिखाया गया था, जिसे देखने वाले आम मतदाता बिल्कुल असली समझ बैठे. इसी तरह ओक्लाहोमा में एक अन्य विज्ञापन के जरिए रिपब्लिकन उम्मीदवार को पूर्व राष्ट्रपति हिलेरी क्लिंटन के साथ हाथ मिलाते हुए दिखाया गया, जबकि यह पूरी तरह से कंप्यूटर जनित यानी एआई की उपज था. इन विज्ञापनों में इस बात का कोई डिस्क्लेमर भी नहीं दिया गया था कि इन्हें असली फुटेज की बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से तैयार किया गया है.
राजनीतिक दलों के लिए एआई का यह नया रूप बेहद किफायती और कम समय लेने वाला साबित हो रहा है, क्योंकि अब महंगे कैमरों, शूटिंग यूनिट और कलाकारों की जरूरत लगभग खत्म हो गई है. कुछ ही क्लिक और कमांड के जरिए किसी भी नेता को किसी भी काल्पनिक परिस्थिति में खड़ा करके वीडियो बनाया जा सकता है, जिससे अलग-अलग इलाकों के मुद्दों जैसे कि महंगाई, अपराध या टैक्स के हिसाब से विज्ञापनों को तुरंत कस्टमाइज किया जा रहा है. हालांकि, कम लागत में बड़े पैमाने पर प्रचार करने का यह तरीका मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा करने का एक बड़ा जरिया भी बनता जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक विज्ञापनों में इस तरह के कृत्रिम और भ्रामक कंटेंट का बेधड़क इस्तेमाल लोकतंत्र के लिए एक नई और बड़ी चुनौती पेश कर रहा है. जब आम जनता असली और नकली वीडियो के बीच फर्क नहीं कर पाएगी, तो चुनाव के दौरान सही फैसला लेना और भी ज्यादा मुश्किल हो जाएगा. हालांकि एआई ने प्रचार के क्षेत्र को बेहद तेज और असरदार बना दिया है, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या आने वाले समय में राजनीतिक विज्ञापनों में पारदर्शिता लाने के लिए कोई कड़े नियम बनाए जाएंगे या नहीं.










