आईडीबीआई बैंक के निजीकरण को लेकर चल रहे विवाद के बीच अब केंद्र सरकार की तरफ से आधिकारिक सफाई सामने आ गई है. वित्त मंत्रालय ने बैंक की बिक्री और उसके मूल्यांकन यानी वैल्यूएशन की पूरी प्रक्रिया का खुलकर बचाव किया है. मंत्रालय का साफ कहना है कि इस पूरी डील के दौरान बैंक के रिजर्व प्राइस यानी न्यूनतम तय मूल्य में किसी भी तरह का फेरबदल नहीं किया गया था. सरकार के अनुसार यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी नियमों और स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर पूरी की गई है.
यह पूरा विवाद तब खड़ा हुआ था जब आईडीबीआई बैंक की बिक्री के लिए पहले चरण में जो बोलियां सामने आईं, वे तय किए गए न्यूनतम मूल्य से कम थीं. इसके बाद सरकार ने दोबारा बोलियां आमंत्रित कीं, जिसमें कनाडा की दिग्गज कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स ने प्रति शेयर 81 रुपए की बोली लगाई. सरकार ने इस वित्तीय प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. इस बड़ी डील के तहत केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी अपनी कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेच रहे हैं, जिसका कुल मूल्यांकन करीब 52,878 करोड़ रुपए आंका गया है.
वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि शुरुआती बोलियां खारिज होने के बाद एक नए और बेहद सख्त दौर की शुरुआत की गई थी. इस प्रक्रिया को कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स द्वारा गठित अधिकार प्राप्त सचिवों के कोर ग्रुप ने तय किया था. मंत्रालय का यह भी दावा है कि वैल्यूएशन के लिए दो स्वतंत्र और पेशेवर सलाहकारों की मदद ली गई थी, जिन्होंने पूरी निष्पक्षता के साथ बैंक की उचित कीमत का आकलन किया. बाजार के नियमों और अन्य सरकारी बैंकों की स्थिति को ध्यान में रखकर यह पूरी कीमत तय की गई थी.
इस डील की सबसे बड़ी खासियत डबल ब्लाइंड प्रोसेस रही है, जिसके तहत बोली लगाने वाली कंपनियों को वैल्यूएशन की जानकारी नहीं दी गई थी और न ही वैल्यूएटर एजेंसियों को बोली की रकम पता थी. इस पूरी व्यवस्था से किसी भी तरह के पक्षपात या प्रभाव की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म कर दिया गया. सरकार का तर्क है कि इस नई और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से सौदे की कुल कीमत में लगभग 3,917 करोड़ रुपए की शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे देश के खजाने को बड़ा फायदा हुआ है.










