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Tamilnadu: क्या तमिलनाडु के ‘नवीन पटनायक’ बनेंगे एमके स्टालिन? BJP को दिख रहा बड़ा राजनीतिक मौका, लेकिन राह में दो बड़ी बाधाएं

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Tamilnadu:  तमिलनाडु की राजनीति में हालिया विधानसभा चुनावों के बाद बड़ा बदलाव देखने को मिला है। दो दशकों से अधिक समय तक साथ चलने वाली कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) की राजनीतिक साझेदारी टूटने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) नई संभावनाओं की तलाश में जुट गई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा इस बदलते समीकरण को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है।

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सूत्रों के मुताबिक, भाजपा की रणनीति केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है, बल्कि वह DMK के साथ वैसा ही संबंध बनाने की संभावना देख रही है जैसा उसका बीजू जनता दल (BJD), YSR कांग्रेस पार्टी (YSRCP) और भारत राष्ट्र समिति (BRS) जैसी पार्टियों के साथ रहा है। ये दल औपचारिक रूप से NDA का हिस्सा नहीं रहे, लेकिन कई मौकों पर केंद्र सरकार को मुद्दों के आधार पर समर्थन देते रहे हैं।

कांग्रेस-DMK रिश्तों में आई दरार

हालिया घटनाक्रम ने कांग्रेस और DMK के रिश्तों में आई खटास को सार्वजनिक रूप से सामने ला दिया है। DMK ने कांग्रेस पर “पीठ में छुरा घोंपने” का आरोप लगाया है। इसके अलावा पार्टी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर संसद में बैठने की नई व्यवस्था करने का अनुरोध किया है, क्योंकि DMK नहीं चाहती कि उसके सांसद कांग्रेस के साथ बैठें।

NDTV की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भाजपा इन राजनीतिक परिस्थितियों को अपने लिए अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी इस संभावना पर काम कर रही है कि DMK कुछ मुद्दों पर केंद्र सरकार के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो सकती है।

पहले भी साथ रह चुके हैं BJP और DMK

BJP और DMK के रिश्ते पूरी तरह नए नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार में DMK सहयोगी दल के रूप में शामिल थी। हालांकि, 2004 में जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की सरकार बनी, तब DMK ने पाला बदल लिया और कांग्रेस की सहयोगी बन गई। इसके बाद दोनों दल लंबे समय तक साथ रहे।

अब जब कांग्रेस और DMK की राहें अलग हो चुकी हैं, तो भाजपा को लग रहा है कि राजनीतिक परिस्थितियां उसके लिए अनुकूल हो सकती हैं।

DMK की कमजोरी को अवसर के रूप में देख रही BJP

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनावों में DMK को नई पार्टी TVK के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा है। वहीं कांग्रेस भी DMK का साथ छोड़कर TVK के साथ खड़ी हो गई है। ऐसे में DMK पर राजनीतिक दबाव बढ़ा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए राज्य और केंद्र दोनों जगह विपक्ष में बने रहना चुनौतीपूर्ण होता है। यही वजह है कि भाजपा को उम्मीद है कि DMK केंद्र के साथ मुद्दों के आधार पर सहयोग की दिशा में आगे बढ़ सकती है।

दोस्ती की राह में दो बड़े रोड़े

हालांकि, BJP और DMK के बीच संभावित नजदीकियों के रास्ते में दो बड़े विवाद सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

परिसीमन और भाषा विवाद

DMK लंबे समय से केंद्र सरकार की प्रस्तावित परिसीमन योजना का विरोध करती रही है। पार्टी का आरोप है कि यह दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व को कमजोर करने की कोशिश है। विधानसभा चुनावों में भी DMK ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था और इसे “दक्षिणी राज्यों पर BJP का हमला” बताया था।

इसके अलावा त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर भी DMK लगातार केंद्र सरकार का विरोध करती रही है। ऐसे में पार्टी के लिए अपने रुख में नरमी लाना आसान नहीं माना जा रहा।

सनातन धर्म पर टकराव

दूसरा बड़ा विवाद सनातन धर्म को लेकर है। DMK नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म विरोधी बयानों ने BJP और DMK के बीच तनाव को और बढ़ाया है। उदयनिधि स्टालिन कई बार सनातन धर्म को समाप्त करने की बात कह चुके हैं, जिस पर भाजपा लगातार हमला बोलती रही है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यह वैचारिक टकराव दोनों दलों के बीच किसी स्थायी समझौते की राह में बड़ी बाधा बन सकता है।

संसद में संख्या बल की मजबूरी

दरअसल, भाजपा के नेतृत्व वाले NDA के पास संसद में दो-तिहाई बहुमत नहीं है। हाल ही में परिसीमन बिल लोकसभा में पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने के कारण पारित नहीं हो सका। सरकार को बहुमत के लिए 54 वोट कम पड़ गए थे। ऐसे में भाजपा ऐसे दलों की तलाश में है जो औपचारिक रूप से NDA में शामिल हुए बिना भी संसद में उसका समर्थन कर सकें। सूत्रों के अनुसार, भाजपा DMK के साथ भी इसी तरह के समीकरण की संभावना तलाश रही है।

लोकसभा में DMK के पास 22 सांसद हैं। यदि पार्टी मुद्दों के आधार पर NDA सरकार का समर्थन करती है, तो इससे केंद्र सरकार की संख्या संबंधी चुनौतियां काफी हद तक कम हो सकती हैं।

Shivam Verma
Author: Shivam Verma

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