Success Story of Sanjay Mehrotra: कानपुर में जन्मे संजय मेहरोत्रा आज अमेरिका की मेमोरी-चिप दिग्गज कंपनी माइक्रोन टेक्नोलॉजी के सीईओ हैं। हालांकि उनकी सफलता का सफर आसान नहीं रहा। एक समय ऐसा भी था जब उन्हें लगातार तीन बार अमेरिकी स्टूडेंट वीजा देने से इनकार कर दिया गया था। लेकिन पिता के दृढ़ संकल्प और उनके संघर्ष ने परिस्थितियों को बदल दिया। आज वही छात्र सिलिकॉन वैली की सबसे महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी कंपनियों में से एक का नेतृत्व कर रहा है।
तीन बार वीजा रिजेक्ट होने के बाद भी नहीं मानी हार
साल 1976 में कानपुर में जन्मे संजय मेहरोत्रा उस समय बिट्स पिलानी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाने की तैयारी के दौरान उन्हें नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास में लगातार तीन बार स्टूडेंट वीजा देने से मना कर दिया गया।
इस दौरान उनके पिता ने हार मानने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। उन्होंने दूतावास की लॉबी में तैनात काउंसलर अधिकारी की तस्वीर देखकर अंदाजा लगाया कि अधिकारी लंच पर गए हुए हैं और वहीं उनका इंतजार करने लगे। उनका सवाल सीधा था कि जब बेटे को तीन विश्वविद्यालयों से कन्फर्म एडमिशन मिल चुका है और सभी दस्तावेज पूरे हैं, तो वीजा क्यों नहीं दिया जा रहा। पिता की यह जिद आखिरकार रंग लाई और संजय मेहरोत्रा को वीजा मिल गया।
संघर्ष से ट्रिलियन डॉलर क्लब तक का सफर
करीब आधी सदी बाद वही छात्र आज माइक्रोन टेक्नोलॉजी का सीईओ है। वॉल स्ट्रीट पर एआई (AI) की बढ़ती मांग के बीच माइक्रोन ने मंगलवार को 1 ट्रिलियन डॉलर (95.71 लाख करोड़ रुपये) के मार्केट कैप का आंकड़ा पार कर लिया।
इसके साथ ही कंपनी ने वॉलमार्ट, बर्कशायर हैथवे और जेपी मॉर्गन चेस जैसी बड़ी कंपनियों को पीछे छोड़ते हुए अमेरिका की टॉप 10 सबसे मूल्यवान कंपनियों में जगह बना ली। सिलिकॉन वैली की यह उन चुनिंदा कहानियों में से एक मानी जा रही है, जहां एक ऐसा व्यक्ति जिसने कभी अमेरिका में प्रवेश के लिए संघर्ष किया था, आज उसी देश की सबसे रणनीतिक टेक्नोलॉजी कंपनियों में से एक की कमान संभाल रहा है।
भारतीय मूल के टेक दिग्गजों की तिकड़ी में शामिल
संजय मेहरोत्रा की सफलता ने कॉर्पोरेट अमेरिका में भारतीय मूल के शीर्ष अधिकारियों की एक उल्लेखनीय तिकड़ी को पूरा कर दिया है। दुनिया की तीन प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनियां—माइक्रोसॉफ्ट, अल्फाबेट और माइक्रोन—आज क्रमशः सत्या नडेला, सुंदर पिचाई और संजय मेहरोत्रा जैसे भारतीय मूल के नेताओं के नेतृत्व में आगे बढ़ रही हैं।
इन तीनों की पृष्ठभूमि भी साधारण रही है। सत्या नडेला हैदराबाद में एक सरकारी अधिकारी के परिवार में पले-बढ़े, जबकि सुंदर पिचाई चेन्नई के एक साधारण अपार्टमेंट में बड़े हुए, जहां पूरे परिवार के पास एक ही रोटरी टेलीफोन हुआ करता था। वहीं संजय मेहरोत्रा का परिवार भी मध्यमवर्गीय था और उनके घर में खुद का टेलीफोन तक नहीं था।
पड़ोसी के फोन से होती थी माता-पिता से बात
अमेरिका में पढ़ाई के शुरुआती दिनों में संजय मेहरोत्रा को अपने माता-पिता से बात करने के लिए पड़ोसी का फोन इस्तेमाल करना पड़ता था। पहले पड़ोसी के यहां फोन किया जाता, फिर वहां से किसी को उनके माता-पिता को बुलाने भेजा जाता था। सीमित संसाधनों के बीच शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर वैश्विक कॉर्पोरेट नेतृत्व तक पहुंचा।
माइक्रोन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया
जहां सुंदर पिचाई और सत्या नडेला को पहले से स्थापित सॉफ्टवेयर कंपनियों का नेतृत्व मिला, वहीं संजय मेहरोत्रा की चुनौती अलग थी। मेमोरी चिप उद्योग को अत्यधिक पूंजी निवेश और लगातार उतार-चढ़ाव वाले कारोबार के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र में लंबे समय से सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स और एसके हाइनिक्स जैसी एशियाई कंपनियों का दबदबा रहा है।
जब संजय मेहरोत्रा ने साल 2017 में माइक्रोन के सीईओ का पद संभाला था, तब कंपनी की वैल्यूएशन लगभग 20 अरब डॉलर थी। एआई आधारित डेटा सेंटरों में हाई-बैंडविड्थ मेमोरी चिप्स की बढ़ती मांग के चलते आज कंपनी ट्रिलियन डॉलर क्लब में पहुंच चुकी है।
2026 में शेयरों में जबर्दस्त उछाल
साल 2026 में अब तक माइक्रोन के शेयरों में 180 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है। केवल मई महीने में ही कंपनी का शेयर 75 प्रतिशत तक उछल गया। कंपनी की इस तेज रफ्तार वृद्धि ने निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
माइक्रोन की सफलता को लेकर व्हाइट हाउस में संजय मेहरोत्रा की मेजबानी के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इसे बाजार के सबसे हॉट स्टॉक्स में से एक बताया था।
भारत में भी कर रही है बड़ा निवेश
सिंगापुर, ताइवान, जापान, चीन और मलेशिया में विस्तार के बाद माइक्रोन अब भारत में भी बड़े निवेश की दिशा में आगे बढ़ रही है। कंपनी गुजरात के साणंद में 2.75 अरब डॉलर (करीब 22,000 करोड़ रुपये) की लागत से एक विशाल ATMP (असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग) फैसिलिटी विकसित कर रही है।
इस परियोजना में माइक्रोन स्वयं 800 मिलियन डॉलर से अधिक का निवेश कर रही है। लगभग 5,00,000 वर्ग फुट के क्लीनरूम स्पेस वाला यह प्लांट दुनिया के सबसे बड़े सिंगल-फ्लोर असेंबली और टेस्ट क्लीनरूम्स में से एक होगा। यह परियोजना भारत को केवल सॉफ्टवेयर-सर्विसेज आधारित अर्थव्यवस्था तक सीमित रखने के बजाय वैश्विक हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
Author: Shivam Verma
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