Lucknow News: माननीय राज्य महिला आयोग, उत्तर प्रदेश की अध्यक्ष डॉ. बबिता सिंह चौहान ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा संचालित पारिवारिक विवाद निवारण क्लिनिक (फैमिली डिस्प्यूट रेजोल्यूशन क्लिनिक—FDRC) को महिलाओं, बच्चों और परिवार की गरिमा व अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक दूरदर्शी और जन-केंद्रित पहल बताया है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था दंडात्मक दृष्टिकोण के स्थान पर संवेदनशीलता, सहानुभूति और संवाद को केंद्र में रखकर पारिवारिक विवादों के समाधान का प्रभावी माध्यम बन रही है।
दंड के बजाय संवाद पर आधारित मॉडल
अध्यक्ष महोदया के अनुसार, FDRC का मूल उद्देश्य पारिवारिक कलह, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और वैवाहिक विवादों को परामर्श, मध्यस्थता और आपसी बातचीत के माध्यम से सुलझाना है। इस प्रक्रिया से पीड़ितों को लंबी कानूनी कार्यवाही, सामाजिक कलंक और मानसिक उत्पीड़न से बचाने में मदद मिलती है। कानून और करुणा के संतुलन के साथ यह पहल न्याय को अधिक मानवीय स्वरूप प्रदान करती है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 में गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) पुलिस और शारदा विश्वविद्यालय के बीच हुए एमओयू से इस प्रयोगात्मक पहल की शुरुआत हुई। 10 जुलाई 2020 को औपचारिक उद्घाटन के बाद यह क्लिनिक पारिवारिक विवादों के समाधान का एक वैकल्पिक और भरोसेमंद मार्ग बनकर सामने आया है। इसके माध्यम से न केवल अनेक परिवारों में सुलह और पुनर्मिलन संभव हुआ, बल्कि न्यायालयों और पुलिस तंत्र पर बढ़ते बोझ में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
बहु-विषयक टीम से निष्पक्ष और गोपनीय समाधान
अध्यक्ष महोदया ने कहा कि FDRC में पुलिस अधिकारी, प्रशिक्षित काउंसलर, सामाजिक कार्यकर्ता तथा आवश्यकता अनुसार विधिक विशेषज्ञों की सहभागिता से बहु-विषयक टीम कार्य करती है। इससे मामलों का निष्पक्ष, गोपनीय और दबाव-मुक्त समाधान संभव हो पाता है। विशेष रूप से महिला पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति महिलाओं को सुरक्षित वातावरण प्रदान करती है, जिससे वे अपनी बात बिना भय के रख सकें।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जहाँ परामर्श और मध्यस्थता से समाधान संभव नहीं होता या गंभीर अपराध के तथ्य सामने आते हैं, वहाँ कानून के अनुसार त्वरित और कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाती है। राज्य महिला आयोग इस बात को लेकर सतर्क है कि किसी भी परिस्थिति में महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों के अधिकारों से समझौता न हो।
डॉ. बबिता सिंह चौहान ने स्वीकार किया कि प्रशिक्षित काउंसलरों की कमी, सामाजिक दबाव और जागरूकता का अभाव जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। इनसे निपटने के लिए उन्होंने पुलिस, महिला आयोग, गैर-सरकारी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों के बीच समन्वित सहयोग, निरंतर प्रशिक्षण कार्यक्रमों, जन-जागरूकता अभियानों तथा मनोवैज्ञानिक और कानूनी सहायता के विस्तार पर विशेष जोर दिया।
Author: Shivam Verma
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