रिपोर्टर: सचिन कुमार मिश्रा
पन्ना, मध्यप्रदेश — मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के पन्ना जनपद में स्थित कगरे की पहाड़ी न सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता का केंद्र है, बल्कि अपने भीतर हजारों वर्ष पुराने ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक रहस्यों को भी समेटे हुए है। यह क्षेत्र आज भी कई वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और श्रद्धालुओं के लिए जिज्ञासा और शोध का विषय बना हुआ है।
प्रागैतिहासिक कालीन शैल चित्रों की उपस्थिति
कगरे की पहाड़ी में स्थित गुफाओं और चट्टानों पर प्रागैतिहासिक काल के शैल चित्र पाए गए हैं, जिनमें मानव आकृतियाँ, पशु-पक्षी और आदिवासी जीवन के दृश्य अंकित हैं। आदिवासी समुदाय की मान्यता है कि ये चित्र आज भी किसी अलौकिक शक्ति के माध्यम से बनते रहते हैं, और यह क्षेत्र आज भी उनके लिए पूजनीय है।
दिव्य जलधारा ‘गंगा’ और रहस्यमयी जल
इस पहाड़ी के मध्य स्थित जल स्रोत को ‘गंगा’ कहा जाता है। स्थानीय ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के अनुसार, यह जल स्रोत केवल प्यासे व्यक्ति को ही दिखाई देता है, और जो प्यासा नहीं होता, उसे यह अदृश्य रहता है। यह मान्यता इस स्थल को एक आध्यात्मिक रहस्य का रूप देती है, जो वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय बन सकती है।
सुरंग द्वार और दिव्य जड़ी-बूटियाँ
यह क्षेत्र कई प्राचीन सुरंग द्वारों और दुर्लभ जड़ी-बूटियों के लिए भी जाना जाता है। इन जड़ी-बूटियों का उल्लेख आदिवासी परंपराओं में कई रोगों के उपचार के लिए किया गया है। यह संभावित रूप से क्षेत्र को वनस्पति विज्ञान और आयुर्वेदिक शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
सुरभि नाला और भगवान श्रीकृष्ण से संबंध
यहां स्थित एक जलधारा जिसे स्थानीय लोग ‘सुरभि नाला’ कहते हैं, का संबंध भगवान श्रीकृष्ण से जोड़ा जाता है। आदिवासी मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान पर आज भी गाय और बछड़े के खुरों के निशान पत्थरों पर स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। कुछ वर्ष पहले यहां 10-12 वर्षीय बालक के पैरों के निशान भी देखे गए थे, जिन्हें अब या तो मिटा दिया गया है या क्षतिग्रस्त कर दिया गया है।
कुश का रहस्य और धार्मिक महत्व
इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में कुश (पवित्र घास) एक से दो किलोमीटर तक फैली हुई पाई जाती है। धार्मिक परंपराओं में कुश का विशेष महत्व है और इसे कई पूजा अनुष्ठानों में उपयोग किया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि यह घास बिना किसी रोपण या देखरेख के यहां स्वयं उत्पन्न होती है।
रहस्यमयी दीपक और संतों की अनुभूतियाँ
कगरे मंदिर में वर्षों से साधना में लीन संतों के अनुसार, यहां एक ऐसा दीपक है जो हर तीन सेकंड में पहाड़ी से उतरता और फिर ऊपर चढ़ता है। यह घटना अभी तक वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट नहीं हो सकी है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह एक दिव्य चमत्कार माना जाता है।
संरक्षण और शोध की आवश्यकता
यह क्षेत्र अपने भीतर इतिहास, संस्कृति, अध्यात्म और प्रकृति का अद्वितीय संगम समेटे हुए है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि अब तक यह क्षेत्र न तो पर्यटन के नक्शे पर है और न ही इसे किसी तरह का सरकारी संरक्षण मिला है।विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यहां वैज्ञानिक और पुरातात्विक शोध करवाए जाएं, तो यह स्थल न केवल भारत के सांस्कृतिक धरोहरों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना सकता है।
निष्कर्ष
कगरे की पहाड़ी आज भी एक जीवित रहस्य है, जहाँ आस्था, प्रकृति और इतिहास एक साथ चलते हैं। अब यह ज़रूरी हो गया है कि इस क्षेत्र को उचित संरक्षण, प्रचार और शोध का अवसर मिले, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस अद्भुत धरोहर से जुड़ सकें।
