MP News: मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है, लेकिन चुनावी गणित से अधिक चर्चा कांग्रेस के भीतर बढ़ती असहमति और संभावित क्रॉस वोटिंग को लेकर हो रही है। कांग्रेस द्वारा राहुल गांधी की करीबी मानी जाने वाली पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद पार्टी के भीतर विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं। इसी बीच बीजेपी भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है और तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारने की संभावना के संकेत दे रही है।
18 जून को होगा मतदान
मध्य प्रदेश से राज्यसभा की जिन तीन सीटों पर चुनाव होना है, वे वर्तमान में केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन, बीजेपी सांसद सुमेर सिंह सोलंकी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के पास हैं। दिग्विजय सिंह पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि वे एक और कार्यकाल के इच्छुक नहीं हैं। इन सीटों के लिए मतदान 18 जून को होना निर्धारित है।
विधानसभा का गणित और बीजेपी की रणनीति
230 सदस्यीय मध्य प्रदेश विधानसभा में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 58 प्रथम वरीयता मतों की आवश्यकता होती है। वर्तमान में बीजेपी के पास 164 विधायक हैं। दो सीटें जीतने के लिए पार्टी को 116 वोटों की जरूरत होगी, जिसके बाद उसके पास 48 वोट शेष बचेंगे। ऐसे में यदि बीजेपी तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो उसे केवल 10 अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता पड़ेगी।
बीजेपी ने फिलहाल अपने राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और प्रदेश मंत्री रजनीश अग्रवाल को उम्मीदवार बनाया है। हालांकि पार्टी नेताओं के बयानों से तीसरे उम्मीदवार की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है।
कांग्रेस के पास संख्या बल, फिर भी चिंता बरकरार
कांग्रेस के पास विधानसभा में 64 विधायक हैं, लेकिन कुछ कानूनी और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उसकी प्रभावी संख्या घट गई है। विजयपुर से विधायक मुकेश मल्होत्रा को चुनावी हलफनामे के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राज्यसभा चुनाव में मतदान करने से रोक दिया है।
वहीं, बीना की विधायक निर्मला सप्रे लोकसभा चुनाव से पहले अनौपचारिक रूप से बीजेपी के साथ जुड़ चुकी हैं और उनके खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही जारी है। इसके अतिरिक्त दतिया के विधायक राजेंद्र भारती पहले ही अयोग्य घोषित किए जा चुके हैं। इन परिस्थितियों में कांग्रेस के पास 62 वैध वोट ही बचे हैं।
संख्या के आधार पर कांग्रेस एक सीट जीतने की स्थिति में है, लेकिन पार्टी नेतृत्व को क्रॉस वोटिंग की आशंका परेशान कर रही है। विधानसभा में भारत आदिवासी पार्टी का भी एक विधायक है, जिसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
कांग्रेस ने पूर्व लोकसभा सांसद मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है। हालांकि पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि यह फैसला संगठनात्मक दृष्टि से विवादास्पद साबित हो सकता है।
विरोध करने वाले नेताओं का कहना है कि 2014 में मंदसौर लोकसभा सीट से हारने के बाद मीनाक्षी नटराजन का प्रदेश के विधायकों और स्थानीय नेताओं से सक्रिय संपर्क सीमित रहा है। इसी वजह से कई नेताओं को लगता है कि वे मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में विधायकों को एकजुट रखने में प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाएंगी।
भोपाल के कांग्रेस नेता नरेश ज्ञानचंदानी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पार्टी नेतृत्व के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे बड़ी गलती बताया। उन्होंने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को टैग करते हुए कहा कि यदि दिग्विजय सिंह को दोबारा मौका दिया जाता तो सीट अधिक सुरक्षित रहती। उन्होंने यह भी कहा कि 2028 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए ऐसे नेता को चुना जाना चाहिए था जिसकी संगठन और कार्यकर्ताओं पर मजबूत पकड़ हो।
द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के एक कांग्रेस विधायक ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि मीनाक्षी नटराजन वरिष्ठ नेता हैं, लेकिन उनका राज्य के नेताओं से संपर्क पहले जैसा नहीं रहा है। विधायक के अनुसार, जब जनप्रतिनिधियों को लगता है कि वे किसी वरिष्ठ नेता तक आसानी से अपनी बात नहीं पहुंचा सकते, तब असंतोष और क्रॉस वोटिंग की आशंका बढ़ जाती है।
बीजेपी ने साधा कांग्रेस पर निशाना
कांग्रेस के भीतर बढ़ते मतभेदों को लेकर बीजेपी लगातार हमलावर है। बीजेपी उम्मीदवार तरुण चुघ ने कहा कि तीसरे उम्मीदवार को उतारने का फैसला पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व करेगा। वहीं वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने स्पष्ट कहा कि यदि पार्टी तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारती है तो उसकी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा।
प्रदेश बीजेपी मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने कांग्रेस नेता नरेश ज्ञानचंदानी की पोस्ट साझा करते हुए कहा कि क्रॉस वोटिंग अब केवल आशंका नहीं रह गई है, बल्कि उसके संकेत भी दिखाई देने लगे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस में आंतरिक विरोध अब खुलकर सामने आ चुका है।
कांग्रेस को क्यों सता रहा है बगावत का डर?
मध्य प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के भीतर असंतोष और बगावत का इतिहास रहा है। यही कारण है कि पार्टी नेतृत्व इस बार किसी भी प्रकार की क्रॉस वोटिंग को लेकर अतिरिक्त सतर्क दिखाई दे रहा है।
2020 में राज्यसभा चुनाव के दौरान हुआ था बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम
मार्च 2020 में राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका लगा था। उस समय ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी नेतृत्व से मतभेदों के बाद कांग्रेस छोड़ दी थी। उनके साथ 22 कांग्रेस विधायकों ने भी इस्तीफा देकर बीजेपी का दामन थाम लिया था।
इस बगावत का सीधा असर कमलनाथ सरकार पर पड़ा और 15 महीने पुरानी कांग्रेस सरकार गिर गई। इसके बाद 23 मार्च 2020 को शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। बाद में जून 2020 में हुए राज्यसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुंचे।
राष्ट्रपति चुनाव में भी दिखी थी क्रॉस वोटिंग
कांग्रेस को 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में भी झटका लगा था। उस दौरान मध्य प्रदेश कांग्रेस के कुछ विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में मतदान किया था। इस घटना ने भी पार्टी नेतृत्व को यह एहसास कराया था कि संख्या बल होने के बावजूद आंतरिक एकजुटता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
राज्यसभा चुनाव से पहले मौजूदा परिस्थितियों में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को एकजुट रखना और किसी भी प्रकार की क्रॉस वोटिंग की संभावना को रोकना है। वहीं बीजेपी इस राजनीतिक असंतोष को अपने पक्ष में अवसर के रूप में देखने की कोशिश कर रही है। 18 जून को होने वाला मतदान अब केवल सीटों का चुनाव नहीं, बल्कि दोनों दलों की संगठनात्मक मजबूती की भी परीक्षा माना जा रहा है।
Author: Shivam Verma
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