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Indian Politics: राहुल गांधी क्यों भूल रहे हैं राजनीति का सबसे बड़ा पाठ? एंटी-इनकंबेंसी भुनाना हर किसी के बस की बात नहीं

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Indian Politics: भारतीय राजनीति में सत्ता विरोधी लहर यानी एंटी-इनकंबेंसी हमेशा से चुनावी हार-जीत का एक बड़ा पैमाना मानी जाती है. अक्सर चुनाव से पहले या नतीजों के बाद इसी बात की चर्चा होती है कि जनता मौजूदा सरकार से कितनी नाराज थी. लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी का मानना है कि उत्तर भारत के हिंदी पट्टी वाले राज्यों में लगातार सरकारों का रिपीट होना कोई स्वाभाविक बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे कोई गहरी साजिश है. उनका तर्क है कि बड़े-बड़े दिग्गज नेता भी एंटी-इनकंबेंसी का शिकार होकर चुनाव हार जाते हैं, ऐसे में कुछ खास नेताओं के मामले में यह नियम क्यों फेल हो जाता है?

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राहुल गांधी के इस तर्क की हवा हाल ही में संपन्न हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव यानी डूसू नतीजों ने निकाल दी. इन चुनावों में कांग्रेस की छात्र विंग एनएसयूआई को करारी हार का सामना करना पड़ा और एबीवीपी ने शानदार जीत दर्ज की. हैरान करने वाली बात यह है कि डूसू के चुनाव मुख्य चुनाव आयोग नहीं करवाता है, इसलिए इसमें किसी भी तरह की धांधली का सवाल ही नहीं उठता. इसके बावजूद, तमाम मुद्दों और छात्रों के बीच सक्रिय रहने के दावों के बावजूद राहुल गांधी की पार्टी चुनाव जीतने में नाकाम रही. इससे साफ जाहिर होता है कि चुनाव केवल सरकार विरोधी लहर के भरोसे नहीं जीते जाते, बल्कि इसके लिए मजबूत चुनावी मैनेजमेंट और सटीक रणनीतिक योजना की जरूरत होती है.

राजनीति में विरोधी दलों को मात देने के लिए एक खास नैरेटिव सेट करना भी बहुत बड़ी कला है. कई बार सरकार के खिलाफ कोई वास्तविक एंटी-इनकंबेंसी होती ही नहीं है, लेकिन विपक्ष जनता के मन में ऐसा डर या नैरेटिव बैठा देता है कि सत्ता पक्ष डिफेंसिव हो जाता है. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने संविधान बदलने का ऐसा ही कामयाब नैरेटिव चलाया था, जिसका असर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में बीजेपी के चुनावी प्रदर्शन पर साफ देखने को मिला था. विपक्ष की इस रणनीति ने सत्ताधारी दल को घेरने का काम बखूबी किया था.

इसके उलट, अगर हिंदी पट्टी के राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां बीजेपी और एनडीए ने अपने विरोधियों के खिलाफ ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि आज पूरा विपक्ष डिफेंसिव मोड में नजर आता है. मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह को ‘मिस्टर बंटाधार’ का ऐसा लेबल मिला कि कांग्रेस आज तक उससे उबर नहीं पाई है. ठीक इसी तरह बिहार में ‘जंगल राज’ और यूपी में ‘माफिया राज’ की याद दिलाकर एनडीए ने विपक्ष को हमेशा के लिए कठघरे में खड़ा कर दिया है. राहुल गांधी इन तमाम रणनीतिक बारीकियों को दरकिनार करके केवल चुनाव आयोग और व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि चुनावी मैदान में पसीना बहाए बिना सिर्फ नतीजों पर रोना रोने से सफलता हासिल नहीं हो सकती.

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