Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर एक बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र के ठाणे जिले में एक अस्पताल के भीतर डॉक्टरों के साथ हुई मारपीट के मामले में शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे को मिली जमानत को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। अदालत ने आरोपी नेता को कड़ी चेतावनी देते हुए आगामी तीन दिनों के भीतर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने का सख्त निर्देश दिया है।
यह पूरा मामला जुलाई महीने का है जब ठाणे के शास्त्री नगर अस्पताल में एक गर्भवती महिला के इलाज में कथित रूप से देरी होने का विवाद खड़ा हो गया था। इस बात से नाराज होकर शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे और उनके साथियों ने अस्पताल परिसर में पहुंचकर ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ पर हमला बोल दिया था। इस घटना के सामने आने के बाद पूरे देश के चिकित्सा जगत में भारी आक्रोश फैल गया था और डॉक्टरों ने अपनी सुरक्षा को लेकर कड़े कदम उठाने की मांग की थी।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बेहद तल्ख टिप्पणी की। सर्वोच्च अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि मेडिकल बिरादरी को किसी भी कीमत पर निशाना नहीं बनाया जा सकता है। दिन-रात जनता की सेवा में जुटे डॉक्टरों पर इस तरह के शारीरिक हमले किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं किए जा सकते हैं और इस मामले में न्याय का संदेश एकदम स्पष्ट जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील ने दलील दी थी कि इस मामले में मुकदमे की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और गवाहों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि म्हात्रे पर पहले से दर्ज आपराधिक मामलों में से अधिकांश में उन्हें बरी किया जा चुका है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया जिसमें पिछले साल अगस्त के महीने में पार्षद और अन्य आरोपियों को जमानत दे दी गई थी।
शीर्ष अदालत के इस कड़े फैसले से देश भर के उन असामाजिक तत्वों और नेताओं को कड़ा संदेश मिला है जो कानून को अपने हाथ में लेते हैं। चिकित्सा संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के इस कदम का स्वागत किया है। अब देखना यह होगा कि आगामी तीन दिनों के भीतर आरोपी पार्षद आत्मसमर्पण करते हैं या नहीं, क्योंकि अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि डॉक्टरों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।










