उत्तर प्रदेश में साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो चुकी है. राज्य की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के सामने इस बार अपनी पुरानी सियासी जमीन को बचाए रखने के साथ-साथ नए समीकरणों को साधना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों और दिशा-निर्देशों को लेकर उपजा विवाद अब सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है, जिससे पार्टी की चिंताएं थोड़ी बढ़ गई हैं.
जानकारों का मानना है कि यूजीसी के इन प्रावधानों का असर सूबे के युवाओं और छात्र वर्ग के साथ-साथ पार्टी के पारंपरिक और मजबूत माने जाने वाले सवर्ण वोटबैंक पर भी पड़ सकता है. हाल ही में हुए विधान परिषद चुनावों के दौरान कुछ इलाकों में सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी साफ तौर पर देखने को मिली थी, जिसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर भी पड़ा था. इसी डैमेज को कंट्रोल करने के लिए अब भगवा पार्टी ने जमीनी स्तर पर एक ठोस रणनीति तैयार कर ली है.
विपक्ष इस पूरे मामले को एक बड़ा राजनीतिक हथियार बनाकर सरकार को घेरने की जुगत में लगा हुआ है. इस सियासी घेराबंदी को तोड़ने के लिए बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मिलकर ‘छात्र संवाद’ और ‘सामाजिक चौपालों’ का सहारा लेने का फैसला किया है. पार्टी यह सुनिश्चित करने में जुटी है कि शिक्षण संस्थानों से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर छात्रों और युवाओं के बीच किसी भी तरह का गलत संदेश न जाए और अफवाहों का समय रहते सटीक जवाब दिया जा सके.
इस पूरी रणनीति को अमलीजामा पहनाने के लिए बीजेपी के तमाम प्रकोष्ठों को मैदान में उतार दिया गया है. पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने साफ निर्देश दिए हैं कि घर-घर जाकर संपर्क किया जाए और मतदाता सूचियों की जांच के साथ-साथ हर वर्ग के लोगों तक सही जानकारी पहुंचाई जाए. शिक्षकों, अधिवक्ताओं, व्यापारियों और युवाओं जैसे तमाम समूहों के साथ बैठकें आयोजित की जा रही हैं ताकि जनता के मन में उठ रहे सवालों और शंकाओं को आसानी से दूर किया जा सके.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक तरफ जहां बीजेपी अपने कोर सवर्ण वोटबैंक को नाराज नहीं करना चाहती, वहीं दूसरी तरफ दलितों और पिछड़ों के बीच अपने सामाजिक समीकरण को भी मजबूत बनाए रखना चाहती है. विपक्षी दलों के पीडीए फॉर्मूले और जातिगत समीकरणों की काट के लिए अब बीजेपी ध्रुवीकरण और जनसंवाद के जरिए हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने के प्रयास में है, ताकि साल 2027 के दंगल में एक बार फिर पूर्ण बहुमत हासिल किया जा सके.










