Uttarakhand News: हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के विभिन्न मंदिरों में पूजा-अर्चना और अनुष्ठानों के दौरान शंख बजाने का विशेष विधान है। सनातन संस्कृति में शंखनाद को अत्यंत शुभ और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। लेकिन उत्तराखंड की गोद में स्थित पावन चार धामों में से एक बदरीनाथ धाम में इसका ठीक उलट नियम है। भगवान विष्णु के इस प्रमुख मंदिर में आज तक कभी भी शंख बजाने की अनुमति नहीं दी गई है और यहां आने वाले श्रद्धालु इस बात से हमेशा हैरान रहते हैं।
भले ही बदरीनाथ मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु, महालक्ष्मी, नर-नारायण और कुबेर देवता को अर्पित किए जाने वाले भोग को पवित्र करने के लिए शंख का प्रयोग किया जाता है, और नित्य पूजा के दौरान भी शंख का इस्तेमाल होता है, परंतु मंदिर परिसर में कभी भी शंखनाद नहीं किया जाता है। मंदिर के कपाट खुलने से लेकर बंद होने तक की तमाम प्रक्रियाओं में शंख की ध्वनि को पूरी तरह वर्जित रखा गया है, जिसके पीछे सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताएं और दंत कथाएं जुड़ी हुई हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में हिमालयी क्षेत्रों में राक्षसों और असुरों का भयंकर प्रकोप बढ़ गया था। उन दिनों अत्याचार करने वाले राक्षसों का नाश करने के लिए महर्षि अगस्त्य ने माता कुष्मांडा की कठोर साधना की थी। माता के प्रकट होने के बाद देवताओं और ऋषियों ने मिलकर उन आसुरी शक्तियों का संहार किया था, लेकिन उस दौरान आतापी और बातापी नाम के दो अत्यंत कुख्यात राक्षस वहां से अपनी जान बचाकर भागने में सफल रहे थे।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भागने के बाद आतापी राक्षस मंदाकिनी नदी में जा छिपा, जबकि बातापी राक्षस ने बदरीनाथ मंदिर के एक शंख के भीतर शरण ले ली। कथावाचकों और जानकारों का मानना है कि यदि आज के समय में इस पवित्र धाम के भीतर शंख बजाया जाए, तो उसकी गूंज से बातापी राक्षस पुनर्जीवित होकर जाग जाएगा। यही वजह है कि अनिष्ट की आशंका से बचने के लिए बदरीनाथ धाम में शंख फूंकने की परंपरा पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है।
इसके अलावा, बदरीनाथ धाम से जुड़ी एक अन्य मान्यता यह भी कहती है कि इस क्षेत्र में भगवान विष्णु साक्षात रूप में निवास करते हैं। ऐसी स्थिति में अपने आराध्य का आह्वान करने के लिए शंख बजाने की आवश्यकता ही नहीं रहती, क्योंकि देवर्षि और भगवान स्वयं वहां उपस्थित हैं। कारण चाहे जो भी हो, उत्तराखंड की हसीन वादियों में स्थित यह रहस्यमयी परंपरा आज भी देश-दुनिया के पर्यटकों और श्रद्धालुओं के बीच गहरी जिज्ञासा का विषय बनी हुई है।










