न्यूजीलैंड में होने वाले आम चुनाव के लिए सियासी पारा अपने चरम पर है। सत्ताधारी नेशनल पार्टी और मुख्य विपक्षी लेबर पार्टी के बीच मुकाबला इतना कड़ा हो गया है कि अंतिम समय में हर वोट की कीमत बढ़ गई है। नवीनतम जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, राजनीतिक दलों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखी जा रही है, जो इस चुनाव के नतीजों को बेहद अनिश्चित बना रही है।
चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा आम जनता की आर्थिक स्थिति बनी हुई है। ‘द पोस्ट/फ्रेशवाटर स्ट्रेटेजी’ के ताजा आंकड़ों की मानें तो लेबर पार्टी को 30.7 प्रतिशत और नेशनल पार्टी को 26.4 प्रतिशत जनसमर्थन मिलता दिख रहा है। हालांकि, बहुमत के जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए गठबंधन की राजनीति निर्णायक साबित हो सकती है, क्योंकि किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार कम ही नजर आ रहे हैं।
इप्सोस के एक हालिया सर्वे में 1,008 मतदाताओं की राय ली गई, जिसमें 64 प्रतिशत लोगों ने जीवन-यापन की बढ़ती लागत और महंगाई को अपनी सबसे बड़ी चिंता बताया है। स्वास्थ्य सेवाओं की बदतर स्थिति और ईंधन की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि भी चुनावी घोषणापत्रों का मुख्य केंद्र बनी हुई है। मतदाताओं की बढ़ती बेचैनी यह साफ कर रही है कि जो भी पार्टी इन आर्थिक चुनौतियों का ठोस समाधान पेश करेगी, वही सत्ता के शिखर तक पहुंचेगी।
मतदान प्रक्रिया को लेकर भी लोगों में खासा उत्साह है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, अग्रिम मतदान (एडवांस वोटिंग) के प्रति नागरिकों ने अच्छी रुचि दिखाई है, जो पिछले चुनाव के मुकाबले मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी का संकेत है। शनिवार को देशभर के 2,300 से अधिक मतदान केंद्रों पर वोट डाले जाएंगे, जिसके बाद नई सरकार का भविष्य तय होगा।
न्यूजीलैंड की ‘मिक्स्ड-मेंबर प्रोपोर्शनल’ चुनावी प्रणाली के कारण गठबंधन का बनना तय माना जा रहा है। 27 नवंबर को जब आधिकारिक नतीजे घोषित होंगे, तब यह स्पष्ट हो पाएगा कि देश की कमान किसके हाथों में होगी। फिलहाल, राजनीतिक दलों के लिए छोटे और क्षेत्रीय सहयोगी दल ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाते हुए दिखाई दे रहे हैं।










