Mughal Empire History: भारतीय इतिहास में मुगल साम्राज्य का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण अध्याय रहा है, जिसने करीब तीन सदियों तक देश के बड़े हिस्से पर राज किया था। मध्य एशिया से आए एक आक्रामक शासक जहीरुद्दीन बाबर के जरिए साल 1526 में इस विशाल सल्तनत की नींव रखी गई थी। पानीपत के पहले मैदान में इब्राहिम लोधी को मात देने के बाद बाबर ने दिल्ली की गद्दी पर कब्जा जमाया और उत्तर भारत में अपनी मजबूत हुकूमत की शुरुआत की थी।
बाबर के बाद हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब जैसे ताकतवर बादशाहों ने इस साम्राज्य को आगे बढ़ाया। हालांकि, औरंगजेब के शासनकाल के बाद से ही इस भव्य सल्तनत के पतन की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी। कमजोर उत्तराधिकारियों, आपसी फूट और आंतरिक संघर्षों ने मुगल साम्राज्य की जड़ों को अंदर से खोखला कर दिया था, जिसका फायदा धीरे-धीरे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी उठाने लगी थी।
वक्त के साथ अंग्रेजों का शिकंजा देश पर कसता चला गया और मुगल बादशाहों की ताकत केवल नाममात्र की रह गई। आलम यह हो गया था कि शाह आलम द्वितीय और उसके बाद के शासकों को अपनी सुरक्षा और गुजर-बसर के लिए अंग्रेजों का मोहताज होना पड़ा था। एक समय दूर-दूर तक परचम लहराने वाले मुगल अब केवल दिल्ली के लाल किले की चारदीवारी तक ही सिमटकर रह गए थे।
इतिहास का वह निर्णायक मोड़ 1857 की क्रांति के दौरान आया, जब देश के विद्रोही सैनिकों ने बूढ़े हो चुके अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को अपना नेता चुन लिया। अंग्रेजों के खिलाफ यह बगावत मुगल नाम के सहारे एक बार फिर उफान पर आई, लेकिन ब्रिटिश सेना ने जल्द ही इस विद्रोह को कुचल दिया और दिल्ली पर दोबारा अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
आठ सितंबर के बाद का वह दौर इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया, जब 20 सितंबर 1857 को ब्रिटिश अधिकारी विलियम हडसन ने हुमायूं के मकबरे से बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर लिया। इस ऐतिहासिक गिरफ्तारी के साथ ही भारत की धरती पर सदियों पुरानी मुगल सल्तनत का हमेशा के लिए सूरज ढल गया और देश की सत्ता पूरी तरह से ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चली गई।
Author: Shivam Verma
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