UP News: उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थिति इन दिनों किसी सामान्य राजनीतिक दल के मुकाबले एक क्वालिटी कंट्रोल लैब जैसी दिखती है. इस लैब की सर्वेसर्वा और चीफ साइंटिस्ट मायावती हैं, जिनके राजनीतिक प्रयोगों के एकमात्र केंद्र उनके भतीजे आकाश आनंद हैं. भारतीय राजनीति में उत्तराधिकार सौंपने की प्रक्रिया बेहद पारंपरिक और सरल होती रही है, जहां वरिष्ठ नेता अपने किसी करीबी को कमान सौंप देते हैं और समय के साथ जनता उसे स्वीकार कर लेती है. लेकिन बसपा के भीतर यह प्रक्रिया बेहद जटिल और अनिश्चितता से भरी हुई है, जहां उत्तराधिकारी को हर कदम पर एक कठिन राजनीतिक परीक्षा से गुजरना पड़ता है.
आकाश आनंद के राजनीतिक सफर पर नजर डाली जाए तो उनका ग्राफ उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. मायावती ने पिछले कुछ सालों में कई बार उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी और फिर अचानक से सभी पदों से मुक्त कर दिया. दिसंबर 2023 में उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के बाद आकाश ने युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश की और ताबड़तोड़ रैलियां कीं. लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान एक भाषण के बाद उन्हें अपरिपक्व करार देते हुए नेशनल कोऑर्डिनेटर के पद से हटा दिया गया. इसके बाद से उनका यह इन-एंड-आउट का दौर लगातार जारी है, जो पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी असमंजस में डाल रहा है.
आकाश आनंद की विदेश में हुई पढ़ाई और उनका आधुनिक अंदाज पारंपरिक बसपा कार्यकर्ताओं से काफी अलग है. वे सूट-बूट में नजर आते हैं, सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहते हैं और अपने भाषणों में बेरोजगारी जैसे मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठाते हैं. उनका यह Gen-Z तेवर दलित युवाओं को अपनी ओर खींचता है, लेकिन जैसे ही यह युवा वर्ग उनके पीछे लामबंद होने लगता है, मायावती का सख्त रुख सामने आ जाता है. जानकारों का मानना है कि पार्टी का युवा वर्ग इस बात से खासा नाराज है कि उनके नेता को लगातार साइडलाइन किया जा रहा है, जबकि आज के दौर में आक्रामक राजनीति ही सफलता की कुंजी है.
मायावती के इस बार-बार बदलते रुख के पीछे कई राजनीतिक मायने निकाले जाते हैं. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मायावती पार्टी पर अपना पूर्ण नियंत्रण रखना चाहती हैं और वे अपनी मौजूदगी में कोई दूसरा पावर सेंटर नहीं बनने देना चाहतीं. वहीं, कुछ लोगों का यह भी कहना है कि केंद्रीय एजेंसियों के दबाव और विरोधी दलों के हमलों से बचने के लिए वे एहतियात के तौर पर ऐसे कदम उठाती हैं. इसके अलावा, एक वर्ग यह भी मानता है कि मायावती एक ओवर-प्रोटेक्टिव अभिभावक की तरह चाहती हैं कि आकाश राजनीति के हर दांव-पेंच को पूरी तरह समझ लें, लेकिन उनका यह कड़ा रवैया नुकसानदेह साबित हो रहा है.
दूसरी तरफ, बसपा का जनाधार लगातार कमजोर होता जा रहा है और पार्टी चुनावी मैदान में अपनी पुरानी ताकत खो चुकी है. एक समय था जब बसपा उत्तर प्रदेश की सत्ता की धुरी हुआ करती थी, लेकिन आज यह पार्टी मुख्य मुकाबले से लगभग बाहर हो चुकी है. ऐसे समय में बुआ और भतीजे के बीच तालमेल की कमी पार्टी के बचे-कुचे कैडर को भी निराश कर रही है. अगर मायावती अपने भतीजे को बार-बार अपरिपक्व बताती रहीं, तो जनता और समर्थक भी उन्हें गंभीरता से लेना छोड़ देंगे. देखना यह होगा कि बसपा की इस मैच्योरिटी लैब से आकाश आनंद को वास्तविक सफलता कब मिलती है और क्या तब तक पार्टी के पास संभालने के लिए कोई मजबूत आधार बचेगा.
Author: Shivam Verma
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