World News: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में एक ऐतिहासिक और लंबे समय से प्रतीक्षित प्रस्ताव को भारी बहुमत से मंजूरी मिल गई है। इस नए फैसले के तहत अब सदियों पुराने और विवादित ‘मर्केटर प्रोजेक्शन’ नक्शे को बदलने का रास्ता साफ हो गया है। अफ्रीकी देश टोगो द्वारा लाए गए इस ‘करेक्ट द मैप’ प्रस्ताव के पक्ष में कुल 164 देशों ने मतदान किया, जबकि अमेरिका ने इसके विरोध में वोट डाला। इस बदलाव के बाद अब वैश्विक स्तर पर नक्शों के रूप-रंग और देशों के आकार को देखने का नजरिया पूरी तरह से बदलने वाला है।
गौरतलब है कि 16वीं सदी में गेरहार्डस मर्केटर द्वारा बनाए गए पारंपरिक नक्शे में गंभीर भौगोलिक विसंगतियां थीं। यह पुराना नक्शा भूमध्य रेखा के पास स्थित देशों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल से काफी छोटा दिखाता था, जबकि उत्तरी गोलार्ध के इलाकों को उनके आकार से कई गुना बड़ा प्रदर्शित करता था। इस खामी के कारण ग्रीनलैंड और अफ्रीका नक्शे पर एक ही आकार के नजर आते थे, जबकि हकीकत में अफ्रीका महाद्वीप ग्रीनलैंड से चौदह गुना बड़ा है। इसी तरह यूरोप और रूस जैसे देश अपनी असल सीमा से कहीं ज्यादा विशाल प्रतीत होते थे।
इस ऐतिहासिक वैश्विक बदलाव का सबसे बड़ा सकारात्मक असर भारत और अफ्रीकी महाद्वीपों पर पड़ेगा। पुरानी भौगोलिक व्यवस्था में भारत को भी उसके वास्तविक क्षेत्रफल के मुकाबले काफी छोटा दिखाया जाता था, जिससे वैश्विक मंचों पर उसकी विशालता और महत्ता दब जाती थी। अब आधुनिक और सटीक ‘इक्वल अर्थ मैप’ को वैश्विक मानक बनाए जाने से भारत और दक्षिण अमेरिकी देशों के साथ-साथ अफ्रीकी देशों को भी उनका सही और न्यायसंगत भौगोलिक अनुपात मिल सकेगा, जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा था।
विशेषज्ञों का मानना है कि पुराना मर्केटर नक्शा औपनिवेशिक मानसिकता की देन था, जिसका इस्तेमाल पश्चिमी ताकतों द्वारा अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए मनोवैज्ञानिक हथियार के रूप में किया जाता था। छोटे आकार में दिखने के कारण विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ के प्रभाव को कमतर आंका जाता था। अब इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में दुनिया भर के स्कूलों, डिजिटल मैपिंग प्लेटफॉर्म्स और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में नए और सटीक नक्शों का ही आधिकारिक उपयोग किया जाएगा।
Author: Shivam Verma
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