हाल ही में नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने जून 2026 की फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (FMGE) के नतीजे घोषित किए हैं, जिसने मेडिकल शिक्षा जगत में एक नई चिंता पैदा कर दी है। इन आंकड़ों के अनुसार, विदेशों से मेडिकल की डिग्री हासिल करके लौटे छात्रों में से केवल 12 प्रतिशत ही यह परीक्षा पास कर सके हैं। यह परिणाम बीते छह परीक्षा सत्रों में सबसे निचला स्तर माना जा रहा है, जो विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई करने वाले छात्रों की योग्यता पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
भारत में नीट यूजी (NEET UG) के जरिए एमबीबीएस की सीमित सीटें होने के कारण हर साल हजारों की संख्या में छात्र विदेश का रुख करते हैं। नेपाल, बांग्लादेश, रूस, जॉर्जिया और कजाकिस्तान जैसे देशों में भारत की तुलना में कम फीस और आसान प्रवेश प्रक्रिया के कारण छात्र वहां जाकर डॉक्टरी की पढ़ाई करना पसंद करते हैं। हालांकि, इन देशों से डिग्री लेकर लौटने के बाद उन्हें भारत में मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए अनिवार्य रूप से एफएमजीई परीक्षा पास करनी पड़ती है, जो अब उनके लिए एक बड़ी बाधा साबित हो रही है।
इस साल जून में आयोजित हुई परीक्षा में कुल 37,448 छात्रों ने भाग लिया था, जिनमें से केवल 4,635 अभ्यर्थी ही सफलता प्राप्त कर सके। विशेषज्ञों का मानना है कि इस असफलता का मुख्य कारण परीक्षा का कठिन स्तर है। एफएमजीई का सिलेबस और पेपर का कठिन स्तर काफी हद तक नीट यूजी के समकक्ष होता है, इसलिए केवल वे ही छात्र इसे उत्तीर्ण कर पाते हैं जिनकी नींव काफी मजबूत होती है। कम पास प्रतिशत यह दर्शाता है कि विदेशों से पढ़ाई करने वाले कई छात्रों को भारत के मेडिकल मानकों के अनुसार खुद को ढालने में भारी संघर्ष करना पड़ रहा है।
एफएमजीई परीक्षा साल में दो बार यानी जून और दिसंबर में आयोजित की जाती है। इसमें कुल 300 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनमें से उत्तीर्ण होने के लिए छात्रों को कम से कम 150 अंक लाना अनिवार्य है। हालांकि, सरकार की ओर से इस परीक्षा में शामिल होने के लिए प्रयासों की कोई सीमा तय नहीं की गई है, जिससे असफल छात्र बार-बार परीक्षा दे सकते हैं। लेकिन गिरता हुआ पासिंग परसेंटेज इस बात का संकेत है कि विदेशी मेडिकल विश्वविद्यालयों की शिक्षण गुणवत्ता और भारतीय परीक्षा प्रणाली के बीच एक बड़ा अंतर बना हुआ है।
इस स्थिति ने उन परिवारों के लिए भी चिंता बढ़ा दी है जो अपने बच्चों को लाखों रुपये खर्च करके विदेश भेजते हैं। डिग्री पूरी करने के बाद भी भारत में लाइसेंस न मिल पाना न केवल छात्रों का समय और पैसा बर्बाद कर रहा है, बल्कि देश में डॉक्टरों की कमी को पूरा करने के प्रयासों को भी प्रभावित कर रहा है। आने वाले समय में इन छात्रों के लिए शिक्षा की गुणवत्ता और बेहतर कोचिंग की आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि वे भारतीय मेडिकल परीक्षाओं में अपनी योग्यता साबित कर सकें।
Author: Shivam Verma
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