Punjab News: पंजाब में पर्यावरण को लेकर एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है, जहां अब केवल महानगरों या शहरी इलाकों तक ही नहीं बल्कि गांवों की हवा भी बेहद जहरीली हो चुकी है। कभी अपनी हरी-भरी हरियाली और शुद्ध ताजी हवा के लिए मशहूर रहने वाले ग्रामीण अंचल अब गंभीर प्रदूषण की चपेट में आ चुके हैं। हाल ही में सामने आई एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक शहरों और गांवों की आबोहवा के बीच का यह फासला घटकर अब मात्र चार प्रतिशत तक ही सिमट कर रह गया है.
सेंटर ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर की तरफ से जारी की गई इस रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इसके अनुसार पंजाब के शहरी क्षेत्रों में खतरनाक सूक्ष्म प्रदूषक कण यानी पीएम 2.5 का औसत स्तर जहां 58.3 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रिकॉर्ड किया गया है, वहीं गांवों में भी यह आंकड़ा 56 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के करीब पहुंच चुका है। जबकि राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता के तय मानकों के हिसाब से इसकी सालाना सीमा केवल 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर ही निर्धारित की गई है.
ग्रामीण इलाकों में इस तरह लगातार बिगड़ते पर्यावरण संतुलन के पीछे कई प्रमुख वजहें जिम्मेदार मानी जा रही हैं। खेतों में बड़े पैमाने पर जलाई जाने वाली पराली, सड़कों पर सरपट दौड़ते अनियंत्रित वाहन, जगह-जगह उड़ती धूल और स्थानीय स्तर पर होने वाला औद्योगिक उत्सर्जन हवा को लगातार मैला कर रहा है। हवा में मौजूद ये अति सूक्ष्म कण आसानी से इंसानी सांस के जरिए फेफड़ों के अंदर तक प्रवेश कर जाते हैं, जिससे आम जनता में गंभीर स्वास्थ्य संबंधी बीमारियां तेजी से पनप रही हैं.
हालांकि पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो साल 2014 के मुकाबले शहरों में दो प्रतिशत और गांवों के प्रदूषण स्तर में चार प्रतिशत की मामूली कमी जरूर दर्ज की गई है। लेकिन जानकारों का मानना है कि राष्ट्रीय मानकों से अभी भी हवा का स्तर काफी ऊपर बना हुआ है, इसलिए इस छोटी सी गिरावट को राहत की सांस या साफ हवा का प्रमाण बिल्कुल नहीं माना जा सकता है। पंजाब के कई बड़े शहर पहले से ही वायु गुणवत्ता मानकों के लिहाज से बेहद खराब स्थिति में गिने जा रहे हैं.
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश के कई प्रमुख जिलों और शहरों का एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी एक्यूआई लगातार येलो जोन या मध्यम श्रेणी में बना हुआ है। जालंधर, खन्ना, लुधियाना, बठिंडा और अमृतसर जैसे इलाकों में आबोहवा का यह स्तर सांस के मरीजों, बुजुर्गों और छोटे बच्चों के लिए बेहद घातक साबित हो रहा है। अगर समय रहते खेतों में पराली प्रबंधन और वाहनों से होने वाले धुएं पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी ज्यादा भयानक हो सकती है.










