Delhi News: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा का पिछले 12 वर्षों का लंबा कार्यकाल अब कानूनी मुश्किलों में घिर गया है। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक ताजा याचिका में उनके लगातार पद पर बने रहने की वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने अप्रैल 2025 में जारी उस सरकारी गजट अधिसूचना को रद्द करने की मांग की है, जिसके माध्यम से कथित तौर पर उनका कार्यकाल 2030 तक बढ़ा दिया गया था। इस याचिका ने कानूनी जगत में हलचल मचा दी है और अब देश की सर्वोच्च अदालत इस मामले पर सुनवाई करेगी।
याचिकाकर्ता अधिवक्ता योगमाया एमजी ने तर्क दिया है कि BCI के नियमों का नियम 12(2) स्पष्ट रूप से चेयरमैन के कार्यकाल को केवल दो साल तक सीमित करता है। याचिका में कहा गया है कि किसी भी प्रशासनिक आदेश या अधिसूचना के जरिए वैधानिक नियमों को दरकिनार कर कार्यकाल में मनमानी बढ़ोतरी नहीं की जा सकती। गौरतलब है कि मनन कुमार मिश्रा 2012 से ही चेयरमैन पद से जुड़े हुए हैं, जिसे याचिका में प्रतिनिधिक लोकतंत्र और अधिवक्ता अधिनियम के प्रावधानों के खिलाफ बताया गया है।
विवाद के केंद्र में केवल कार्यकाल ही नहीं, बल्कि बीसीआई की वित्तीय पारदर्शिता और संस्थागत निष्पक्षता भी है। याचिका में मांग की गई है कि बीसीआई के वित्तीय मामलों, ट्रस्ट ‘पीयरल-फर्स्ट’ और ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) से जुड़ी आय का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष समिति गठित करने का आग्रह किया गया है, ताकि संस्था के कामकाज की निष्पक्ष जांच हो सके।
याचिका में मनन कुमार मिश्रा के राजनीतिक जुड़ाव का भी मुद्दा उठाया गया है। उनके 2024 में भाजपा से राज्यसभा सदस्य बनने के बाद से ही बीसीआई की स्वतंत्रता और तटस्थता पर सवाल उठ रहे हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि एक प्रमुख कानूनी नियामक संस्था के पद पर रहते हुए सक्रिय राजनीति में भागीदारी संस्थागत संतुलन को प्रभावित करती है। इसी को देखते हुए भविष्य के लिए चेयरमैन के कार्यकाल की अधिकतम सीमा तय करने और रोटेशन प्रणाली लागू करने की सिफारिश की गई है।
अंत में, याचिका में तत्काल प्रभाव से नए चुनाव कराने और चेयरमैन पद के लिए कूलिंग-ऑफ अवधि अनिवार्य करने की बात कही गई है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के रुख पर सबकी निगाहें टिकी हैं कि क्या अदालत मनन कुमार मिश्रा को पद से हटाने या किसी अंतरिम प्रशासनिक समिति के गठन का निर्देश देती है। यह मामला न केवल एक व्यक्ति का है, बल्कि भारतीय कानूनी पेशे को नियंत्रित करने वाली शीर्ष संस्था की जवाबदेही और लोकतांत्रिक ढांचे को सुदृढ़ करने के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
Author: Shivam Verma
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