भारत के पड़ोसी देशों का रुख जल संसाधनों के बंटवारे को लेकर लगातार सख्त होता जा रहा है। हाल ही में बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री मोहम्मद शाहिद उद्दीन चौधरी अनी ने गंगा जल संधि में ‘गारंटी क्लॉज’ को फिर से शामिल करने की मांग की है। उन्होंने तीस्ता नदी के पानी के मसले पर भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घसीटने की चेतावनी दी है। यह मांग ऐसे समय पर आई है जब दिसंबर 2026 में पुरानी जल संधि समाप्त होने वाली है, जिससे कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
दिलचस्प बात यह है कि बांग्लादेश की यह रणनीति पाकिस्तान से काफी मिलती-जुलती नजर आती है। इससे पहले अप्रैल 2026 में पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का दरवाजा खटखटाया था, हालांकि वहां उसे कोई विशेष समर्थन नहीं मिल पाया। दोनों देशों की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए अब राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि क्या भारत के खिलाफ ‘वॉटर डिप्लोमेसी’ का एक नया और साझा मोर्चा तैयार किया जा रहा है, जिसका मकसद नई दिल्ली पर दबाव बनाना है?
बांग्लादेश की मुख्य चिंता सूखे के मौसम में पानी की उपलब्धता को लेकर है। मंत्री का तर्क है कि 1977 की संधि में मौजूद गारंटी क्लॉज को 1996 में हटा दिया गया था, जिसे बहाल किया जाना चाहिए ताकि पानी की कमी के बावजूद बांग्लादेश को उसका तय हिस्सा मिल सके। ढाका ने यूएनईसीई वाटर कन्वेंशन की सदस्यता भी ले ली है, जिसे वह अपनी मांगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती देने के लिए एक आधार के रूप में देख रहा है। हालांकि, भारत इस कन्वेंशन का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसका कानूनी प्रभाव सीमित ही रहने वाला है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच पानी के मुद्दे पर बढ़ रहा तालमेल भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय हो सकता है। भले ही अभी तक कोई औपचारिक गठबंधन नहीं बना हो, लेकिन दोनों देशों की समान भाषा और अंतरराष्ट्रीय मंचों को इस्तेमाल करने की होड़ स्पष्ट संकेत देती है कि भविष्य में सीमा पार नदियों का मुद्दा और अधिक पेचीदा हो सकता है। अब देखना यह है कि भारत इस बढ़ते कूटनीतिक दबाव का सामना कैसे करता है और गंगा व तीस्ता नदी के मसलों पर क्या रुख अपनाता है।
Author: Shivam Verma
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