BRICS Summit: 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन इस समय वैश्विक राजनीति में एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर हो रहा है. दुनिया भर में आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है, ऐसे में प्रतिष्ठित अमेरिकी और दक्षिण एशिया मामलों के विश्लेषक माइकल कुगेलमैन ने इस आयोजन को लेकर बड़ा बयान दिया है. उनके अनुसार, यह सम्मेलन भारत के लिए वैश्विक मंच पर अपनी नेतृत्व क्षमता को नए सिरे से स्थापित करने और ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज बनने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है.
माइकल कुगेलमैन ने विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति विकासशील देशों के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा है. ऐसे दौर में ब्रिक्स जैसे प्रभावशाली मंच की भूमिका काफी अहम हो जाती है. यह संगठन ग्लोबल साउथ की उम्मीदों को पूरा करने और दुनिया को एक नया आर्थिक और कूटनीतिक विकल्प देने की क्षमता रखता है, जिससे भारतीय विदेश नीति के मुख्य उद्देश्यों को भी बल मिलता है.
हालांकि, इस वैश्विक आयोजन के सफल संचालन में कई बड़ी कूटनीतिक चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं. कुगेलमैन का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में देशों के शामिल होने के बाद एक साझा और ठोस संयुक्त बयान जारी करना सबसे कठिन परीक्षा होगी. विशेष तौर पर पश्चिमी एशिया के मौजूदा तनाव और अलग-अलग देशों के भिन्न हितों के बीच सभी सदस्यों को एक मंच पर लाना एक जटिल कार्य साबित हो सकता है.
विशेषज्ञ ने यह भी रेखांकित किया कि इस सम्मेलन के दौरान भारत को कूटनीति का बेहद बारीक संतुलन साधना होगा. एक तरफ जहां समूह के भीतर रूस, ईरान और चीन जैसे देशों का प्रभाव है, वहीं दूसरी तरफ भारत के पश्चिमी देशों और खासकर अमेरिका के साथ गहरे व्यापारिक संबंध हैं. ऐसे में किसी भी प्रकार के तीखे बयानों से बचते हुए सभी के साथ तालमेल बिठाना भारत की कूटनीतिक कुशलता की असल परीक्षा है.
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स बिजनेस फोरम के दौरान साफ कर दिया है कि भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच दुनिया के लिए विकास और भरोसे का मजबूत प्रतीक बन रहा है. भारत का यह रुख और अमेरिका के एक्सपर्ट्स द्वारा की जा रही सराहना यह साबित करती है कि वैश्विक पटल पर भारत की भूमिका अब केवल एक हिस्सेदार की नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक के रूप में स्थापित हो रही है.
Author: Shivam Verma
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