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Jharkhand Student Protest: ‘क्या हमारी कीमत कीड़ों से भी कम है?’, युवाओं का छलका दर्द और सरकार से तीखे सवाल

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Jharkhand Student Protest: झारखंड की राजधानी रांची इन दिनों एक बड़े छात्र आंदोलन का केंद्र बनी हुई है। शहर के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम और रवींद्र भवन के पास हजारों की संख्या में अभ्यर्थी अपनी मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि यह केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सालों की मेहनत, उम्मीदों और एक दूषित हो चुके भर्ती सिस्टम के खिलाफ आर-पार की लड़ाई है।

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सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में छात्रों का आक्रोश साफ झलक रहा है। एक महिला अभ्यर्थी ने बेहद भावुक होते हुए सिस्टम से सवाल किया कि क्या एक छात्र की वैल्यू कीड़े-मकौड़ों जैसी भी नहीं है? छात्रों का तर्क है कि वे सिर्फ अपनी मांगों को नहीं रख रहे, बल्कि उन सालों के संघर्ष को बयां कर रहे हैं जो सरकारी नौकरी की आस में व्यर्थ हो गए। उनका कहना है कि सरकारी दफ्तरों में उनकी सुनवाई न होना ही उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर रहा है।

आंदोलन कर रहे छात्रों का मुख्य आरोप JPSC और JSSC की परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर हुई अनियमितताओं को लेकर है। अभ्यर्थियों ने कट-ऑफ जारी करने में विसंगतियों, OMR शीट में गड़बड़ी और बार-बार होने वाले पेपर लीक जैसी गंभीर समस्याएं उठाई हैं। छात्रों की मांग है कि इन परीक्षाओं को तुरंत रद्द किया जाए और पूरे मामले की सीबीआई से निष्पक्ष जांच कराई जाए ताकि भविष्य में युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो सके।

रांची में चल रहा यह प्रदर्शन अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कई छात्रों का मानना है कि यह दिल्ली के किसी बड़े आंदोलन से कम नहीं है। प्रदर्शनकारी स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि उन्हें खोखले आश्वासनों की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें न्याय और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया चाहिए। युवाओं की यह हुंकार अब सत्ता के गलियारों तक पहुंच रही है, जहां वे अपने भविष्य को बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं।

इस पूरे मामले ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था और रोजगार के अवसरों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब तक सरकार इन छात्रों की मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक आंदोलन के और तेज होने की संभावना बनी हुई है। फिलहाल, रांची का यह ‘जंतर-मंतर’ युवाओं के उस दर्द का गवाह बना है जो अपनी ही मेहनत की खातिर सड़कों पर बैठने को मजबूर हैं।

Shivam Verma
Author: Shivam Verma

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