Kannappa Nayanar Story: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे उत्तम माना गया है. इस दौरान मंदिरों में भक्तों का तांता लगा रहता है और लोग विधि-विधान के साथ अभिषेक करते हैं. लेकिन भक्ति की दुनिया में एक ऐसा नाम भी है जिसने शास्त्रों के कठिन नियमों से परे जाकर प्रभु को रिझाया था. यह महान भक्त कोई और नहीं, बल्कि शिव के अनन्य भक्त कन्नप्पा नयनार हैं, जिनकी कहानी आज भी दुनिया भर के श्रद्धालुओं को भावविभोर कर देती है. उनके समर्पण का भाव इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर को पाने के लिए बाहरी दिखावे की नहीं, बल्कि केवल निश्छल प्रेम की आवश्यकता होती है.
कन्नप्पा नयनार एक शिकारी समुदाय से ताल्लुक रखते थे और जंगल में ही अपना जीवन व्यतीत करते थे. उन्हें पूजा-पाठ की शास्त्रीय विधियों का कोई ज्ञान नहीं था, लेकिन जब उन्होंने श्रीकालहस्ती के जंगल में शिवलिंग को देखा, तो वे पूरी तरह समर्पित हो गए. कन्नप्पा का तरीका बाकी लोगों से बिल्कुल अलग था. वे शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए अपने मुख में गंगाजल भरकर लाते थे और जंगल से प्राप्त कंद-मूल तथा मांस का भोग लगाकर अपनी भक्ति प्रकट करते थे. उनके लिए वह पत्थर का टुकड़ा नहीं, बल्कि साक्षात भोलेनाथ थे.
मंदिर के नियमित पुजारी इस तरह की पूजा देखकर बेहद आहत थे और इसे अपवित्रता मानते थे. हालांकि, पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं पुजारी को स्वप्न में दर्शन देकर बताया कि कन्नप्पा की पूजा उन्हें किसी भी विधि-विधान से अधिक प्रिय है. एक दिन अपनी परीक्षा लेने के लिए महादेव ने लीला रची और शिवलिंग से रक्त बहने लगा. अपने आराध्य को कष्ट में देखकर कन्नप्पा व्याकुल हो गए और उन्होंने अपनी एक आंख निकालकर शिवलिंग पर रख दी, जिससे रक्त बहना बंद हो गया.
अद्भुत प्रेम का परिचय देते हुए, जब शिवलिंग की दूसरी आंख से भी खून निकलने लगा, तो कन्नप्पा बिना किसी संकोच के अपनी दूसरी आंख भी निकालने के लिए तैयार हो गए. वे अपनी दूसरी आंख निकालने ही वाले थे कि तभी भगवान शिव स्वयं उनके सामने प्रकट हो गए. महादेव ने अपने इस महान भक्त को न केवल उसकी दृष्टि वापस दी, बल्कि उसे अमरता का आशीर्वाद देते हुए अपने चरणों में स्थान प्रदान किया. यह घटना साबित करती है कि प्रेम ही सबसे बड़ी भक्ति है.
आज भी आंध्र प्रदेश का श्रीकालहस्ती मंदिर कन्नप्पा नयनार की इस अविस्मरणीय गाथा को संजोए हुए है. यहाँ के वायु लिंग की पूजा करते हुए भक्त कन्नप्पा के उस त्याग को याद करते हैं. उनकी कहानी हमें सिखाती है कि धर्म का वास्तविक अर्थ अनुष्ठानों के पीछे छिपे भाव को समझने में है. सावन के इस पवित्र अवसर पर कन्नप्पा की यह जीवन गाथा हमें निस्वार्थ भाव से शिव की भक्ति में लीन होने की प्रेरणा देती है.
Author: Shivam Verma
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