World News: पड़ोसी देश पाकिस्तान में इस समय राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद का खतरा अपने चरम पर पहुंच चुका है, जिसके चलते प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार ने बेहद कड़े कदम उठाए हैं. देश के अशांत प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में आधिकारिक तौर पर आपातकाल और गवर्नर रूल लागू कर दिया गया है. राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की मंजूरी मिलने के बाद प्रांतीय सरकार के तमाम अधिकार अब सीधे गवर्नर के हाथों में सौंप दिए गए हैं, जिससे इलाके में सियासी सरगर्मी काफी बढ़ गई है.
इस फैसले के तहत संघीय सरकार ने खैबर पख्तूनख्वा में कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए सेना को मैदान में उतारने का निर्देश जारी किया है. रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में इस क्षेत्र में आतंकवाद की छह हजार से अधिक घटनाएं दर्ज की गई हैं जिनमें हजारों लोगों की जान जा चुकी है. सरकार का तर्क है कि स्थानीय पुलिस बल चरमपंथियों से निपटने में पूरी तरह सक्षम नहीं है और सुरक्षा व्यवस्था को संभालने के लिए सैन्य बलों की मदद लेना अब अनिवार्य हो गया था.
दूसरी तरफ, पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ यानी पीटीआई ने इस आपातकाल और सैन्य तैनाती को पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित करार दिया है. पीटीआई समर्थकों का आरोप है कि सरकार विपक्षी दलों की आवाज दबाने और लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने के लिए प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग कर रही है. इस राजनीतिक टकराव के कारण देश की आंतरिक स्थिति लगातार और अधिक जटिल होती जा रही है.
खैबर पख्तूनख्वा के अलावा आर्थिक राजधानी कराची में भी प्रशासन ने सख्ती बरतते हुए बीस अक्टूबर तक धारा 144 लागू कर दी है. इसके तहत सार्वजनिक जगहों पर पांच या उससे अधिक लोगों के जमा होने, रैलियां निकालने और किसी भी तरह के धरने-प्रदर्शन पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है. प्रशासन का कहना है कि लगातार हो रहे प्रदर्शनों से आम जनता की आवाजाही और ट्रैफिक व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो रही थी, जिसके चलते यह कदम उठाया गया है.
फिलहाल पाकिस्तान सरकार के सामने एक साथ दो बड़ी और गंभीर चुनौतियां खड़ी हैं. एक तरफ उसे अफगानिस्तान सीमा से लगे इलाकों में बढ़ते आतंकवाद पर लगाम कसनी है, तो दूसरी तरफ इमरान खान की रिहाई की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे समर्थकों के भारी असंतोष को संभालना है. आने वाला वक्त ही यह तय करेगा कि इन सख्त और दमनकारी फैसलों से देश में अमन-चैन बहाल होता है या फिर सरकार, सेना और विपक्ष के बीच का यह टकराव और अधिक खतरनाक रूप ले लेता है.










