Parliament Mansoon Session 2026: संसद का मॉनसून सत्र 2026 आज 13 अगस्त को हंगामेदार विदाई के साथ संपन्न हो गया। इस सत्र के दौरान दोनों सदनों में कामकाज के बजाय नारेबाजी और विरोध प्रदर्शनों का शोर ज्यादा सुनाई दिया। सत्र के आखिरी दिन भी वंदे मातरम के गायन के बाद लोकसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई, जबकि राज्यसभा में महज एक घंटे की चर्चा हो पाई। जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन, चंदा चोरी के आरोप और एफसीआरए बिल जैसे संवेदनशील मुद्दों ने पूरे सत्र के दौरान सदन की मर्यादा और गति को प्रभावित किया।
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, इस सत्र का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। योजना के मुताबिक लोकसभा और राज्यसभा को कुल 133-133 घंटे काम करना था, लेकिन हंगामे और बार-बार स्थगन के चलते सदन अपने तय लक्ष्य के आसपास भी नहीं पहुंच सके। राज्यसभा की प्रोडक्टिविटी इस दौरान मात्र 39.17 फीसदी दर्ज की गई। तय समय के मुकाबले सदन केवल 37 घंटे 49 मिनट ही सुचारू रूप से चल सका, जिसका सीधा असर विधायी कार्यों पर पड़ा है।
लोकसभा का हाल तो और भी बुरा रहा, जहां प्रोडक्टिविटी गिरकर महज 16 फीसदी तक पहुंच गई। सदन पूरे सत्र के दौरान सिर्फ 17.4 घंटे ही वास्तविक कामकाज कर पाया, जबकि कार्यक्रम के हिसाब से इसे कहीं अधिक समय मिलना चाहिए था। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बनी गतिरोध की स्थिति के कारण सदन को रोज दोपहर और शाम के लिए बार-बार स्थगित करना पड़ा। अंततः भारी हंगामे के बीच लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया गया।
संसदीय कार्यवाही पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि संसद के हर सत्र में अब यही पैटर्न दोहराया जा रहा है। विपक्षी दल जहां सरकार पर गंभीर मुद्दों से भागने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं सरकार का कहना है कि वे चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार थे लेकिन विपक्ष ने सदन चलने ही नहीं दिया। इस आरोप-प्रत्यारोप के खेल में देश की बहुमूल्य जनता का पैसा और समय बर्बाद हो रहा है, जिससे अहम विधेयकों पर गंभीर चर्चा की गुंजाइश खत्म होती जा रही है।
अब सबकी निगाहें आगामी शीतकालीन सत्र पर टिकी हैं, जहां उन लंबित विधेयकों और संवेदनशील विषयों पर चर्चा की उम्मीद की जा सकती है जो इस बार हंगामे की भेंट चढ़ गए। मॉनसून सत्र 2026 ने एक बार फिर संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि भविष्य में सदन की उत्पादकता को नहीं सुधारा गया, तो जनता के प्रतिनिधित्व और देश की नीति निर्माण प्रक्रिया पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ना तय है।
Author: Shivam Verma
Description










