UCC Explainer: देश की राजनीति में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ किया है कि भारतीय जनता पार्टी की योजना साल 2029 से पहले देश के एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में यूसीसी को प्रभावी ढंग से जमीन पर उतारने की है। इस घोषणा के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में हलचल मची हुई है क्योंकि अलग-अलग दलों की इस पर अपनी अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
समान नागरिक संहिता का सीधा मतलब यह है कि किसी भी राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए धर्म या जाति से ऊपर उठकर शादी, तलाक, गोद लेने और संपत्ति के बंटवारे जैसे विषयों पर एक जैसा कानून लागू हो। संविधान के अनुच्छेद 44 में भी राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों के तहत यूसीसी का जिक्र किया गया है, जिसका उद्देश्य देश के विभिन्न समुदायों के बीच सामंजस्य स्थापित करना और न्याय व्यवस्था को एकरूपता देना है।
इस दिशा में कई राज्यों ने पहले ही अपने कदम बढ़ा दिए हैं। उत्तराखंड में यूसीसी पहले ही लागू किया जा चुका है, जबकि गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी इससे जुड़े विधेयकों को मंजूरी मिल चुकी है। इसके अलावा गोवा में ऐतिहासिक रूप से लंबे समय से सिविल कोड लागू है और अब महाराष्ट्र सरकार भी शीतकालीन सत्र के दौरान इस पर बड़ा कदम उठाने की तैयारी में जुटी हुई है।
हालांकि, इस पूरी योजना को अमलीजामा पहनाने की राह में कुछ राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियां भी दिखाई दे रही हैं। एनडीए गठबंधन में शामिल कुछ सहयोगी दल जैसे जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी ने जल्दबाजी करने के बजाय सभी धार्मिक समूहों और हितधारकों से व्यापक चर्चा करने की वकालत की है। उनका मानना है कि आदिवासी संस्कृतियों और स्थानीय परंपराओं का पूरा ध्यान रखा जाना बेहद जरूरी है।
दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने सरकार की इस रणनीति पर कड़े सवाल उठाए हैं। असदुद्दीन ओवैसी और उमर अब्दुल्ला जैसे नेताओं का आरोप है कि इस तरह राज्यवार कानून बनाने के बजाय संसद के माध्यम से व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए। बहरहाल, साल 2029 तक 21 राज्यों में यूसीसी लागू करने का यह लक्ष्य भाजपा के प्रमुख वैचारिक एजेंडे का हिस्सा है, जिस पर आने वाले दिनों में और तीखी राजनीतिक रस्साकशी देखने को मिल सकती है।
Author: Shivam Verma
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