UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर जातीय समीकरणों का दौर तेज हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से भारतीय जनता पार्टी ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अपना बड़ा ओबीसी ब्लूप्रिंट पेश कर दिया है। पार्टी ने संगठनात्मक बदलाव करते हुए महानगर अध्यक्ष, जिलाध्यक्ष और अब काशी क्षेत्र के अध्यक्ष की जिम्मेदारी पिछड़े वर्ग के नेताओं को सौंपकर सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम विपक्ष के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले को जवाब देने की एक सोची-समझी रणनीति है। अब वाराणसी में पार्टी की तीनों प्रमुख संगठनात्मक इकाइयां ओबीसी नेतृत्व के हाथों में हैं। भाजपा का लक्ष्य गैर-यादव पिछड़ा वर्ग को अपने पाले में और मजबूती से लाकर वोट बैंक को सुरक्षित करना है।
वाराणसी को भाजपा की राजनीतिक प्रयोगशाला माना जाता है। यहाँ से सामाजिक संतुलन का जो संदेश दिया गया है, उसके असर उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी देखने को मिल सकते हैं। अशोक चौरसिया को काशी क्षेत्र का अध्यक्ष बनाने के साथ ही राम सकल पटेल और प्रदीप अग्रहरी जैसे नेताओं को महत्वपूर्ण पद देकर पार्टी ने जमीनी स्तर पर ओबीसी वर्ग के प्रतिनिधित्व को नई ऊंचाई दी है।
इस बदलाव के पीछे की मुख्य वजह वाराणसी का जटिल जातीय गणित है। यहाँ की आठ विधानसभा सीटों में से कई पर यादव, राजभर, पटेल और दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव के बाद जिस तरह से विपक्ष ने पिछड़ों की हिस्सेदारी को मुद्दा बनाया था, उसे देखते हुए भाजपा का यह संगठनात्मक फेरबदल एक रक्षात्मक के साथ-साथ आक्रामक चुनावी तैयारी का हिस्सा भी माना जा रहा है।
फिलहाल, भाजपा का यह नया दांव कितना कारगर साबित होता है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। हालांकि, इतना तय है कि 2027 की चुनावी जंग में पिछड़ों को साधने के लिए हर दल अपनी पूरी ताकत झोंकने को तैयार है। भाजपा का यह ओबीसी केंद्रित मॉडल विपक्ष की घेराबंदी को तोड़ने के लिए एक ठोस तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।











