Bihar Panchayat Election: बिहार में आगामी पंचायत चुनावों को लेकर पटना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुखिया के चुनाव में आरक्षण तय करने के लिए बिहार पंचायत राज अधिनियम की धारा 15(5) के प्रावधान ही मान्य होंगे। हाई कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि सरकारी नौकरियों में लागू होने वाला आरक्षण कानून पंचायत चुनावों की प्रक्रिया पर सीधे तौर पर लागू नहीं किया जा सकता है।
यह फैसला जस्टिस पार्थ सारथी की एकल पीठ ने मो. ईसा द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुनाया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पंचायत चुनाव की प्रकृति और सेवा भर्ती के नियम पूरी तरह अलग हैं, इसलिए इन्हें एक समान मानकर नहीं चलना चाहिए। कोर्ट के इस फैसले से राज्य निर्वाचन आयोग और जाति जांच समिति के पुराने फैसलों को बड़ा झटका लगा है, जिसमें सरकारी सेवा वाले नियमों के आधार पर कार्रवाई की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि सहरसा जिले की ग्राम पंचायत राज सहुरिया से जुड़ी है। साल 2021 के चुनाव में निर्वाचित मुखिया को जाति संबंधी शिकायतों के चलते उनके पद से हटा दिया गया था। आरोप था कि संबंधित व्यक्ति ने गलत तरीके से अत्यंत पिछड़ा वर्ग का प्रमाण पत्र हासिल किया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि राज्य निर्वाचन आयोग और जाति जांच समिति ने 1991 के आरक्षण कानून के तहत गलत तरीके से कार्रवाई की थी, जो इस मामले में प्रासंगिक नहीं था।
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि याचिकाकर्ता के पूर्वज भले ही मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जौनपुर से थे, लेकिन उनकी कई पीढ़ियां बिहार में ही रह रही हैं, इसलिए उन्हें राज्य का स्थायी निवासी मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने याचिकाकर्ता के हक में फैसला सुनाते हुए जाति जांच समिति और आयोग के पिछले आदेशों को पूरी तरह से रद्द कर दिया है।
फिलहाल बिहार में पंचायत चुनाव की तारीखों का ऐलान अभी बाकी है। पंचायती राज विभाग की ओर से संकेत दिए गए हैं कि परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही चुनाव संपन्न कराए जाएंगे, जिसके चलते इन चुनावों के अगले साल होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। हाई कोर्ट का यह स्पष्टीकरण आने वाले चुनावों में आरक्षण से जुड़े विवादों को कम करने में मददगार साबित हो सकता है।
Author: Shivam Verma
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