भारतीय शेयर बाजार में पिछले कुछ महीनों से जारी लगातार गिरावट ने निवेशकों की नींद उड़ा दी है। सेंसेक्स और निफ्टी जैसे प्रमुख इंडेक्स में आई भारी कमजोरी के कारण निवेशकों के पोर्टफोलियो को तगड़ा झटका लगा है। बाजार के जानकारों का मानना है कि इस मंदी के पीछे केवल वैश्विक कारण ही नहीं, बल्कि विदेशी संस्थागत निवेशकों की आक्रामक बिकवाली भी एक बड़ा मुख्य कारक है। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2026 की शुरुआत से लेकर अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से भारी-भरकम पूंजी निकाल ली है, जिससे मार्केट का सेंटिमेंट पूरी तरह से बिगड़ चुका है।
विदेशी निवेशकों द्वारा की जा रही धन की निकासी का यह सिलसिला जनवरी महीने से ही शुरू हो गया था, जो अक्टूबर आते-आते और अधिक गहरा गया। मार्च और अक्टूबर जैसे महीनों में एफआईआई की बिकवाली का आंकड़ा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इस भारी-भरकम निकासी के चलते भारतीय शेयर बाजार का मार्केट कैप लाखों करोड़ रुपये घट चुका है। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने बाजार को संभालने की पूरी कोशिश की, लेकिन विदेशी पूंजी के लगातार बाहर जाने के दबाव के आगे घरेलू समर्थन ज्यादा देर टिक नहीं पाया।
बाजार विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि निवेशकों के मोहभंग होने के पीछे टैक्स नीतियों का भी हाथ है। जब सरकार ने फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस ट्रेडिंग पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स यानी एसटीटी बढ़ाने का निर्णय लिया था, तब बाजार में भूचाल आ गया था। इसके अलावा भारत में निवेशकों को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन जैसे कई कर चुकाने होते हैं, जिसके कारण विदेशी निवेशकों को अन्य वैश्विक बाजारों की तुलना में यहां रिटर्न कम आकर्षक नजर आता है। हालांकि वित्त मंत्री ने इस पर चिंता जताते हुए टैक्स नियमों को सरल बनाने और निवेशकों की राय लेने के संकेत दिए हैं।
टैक्स और विदेशी बिकवाली के अलावा वैश्विक मोर्चे पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में Crude Oil के दाम ऊंचे बने रहने के कारण भारतीय शेयर बाजार में अस्थिरता बरकरार है। जब तक भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं होते और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी नहीं आती, तब तक बाजार के तेजी से उबरने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है।
इन तमाम नकारात्मक परिस्थितियों के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था के बुनियादी फंडामेंटल्स बेहद मजबूत बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित कई वैश्विक एजेंसियों ने भारत की विकास दर को लेकर सकारात्मक अनुमान जताए हैं और इसे दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था माना है। ऐसे में निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे घबराने के बजाय लंबी अवधि के नजरिए से चुनिंदा और मजबूत शेयरों में निवेश करें, ताकि बाजार के संभलने पर उन्हें बेहतर मुनाफा मिल सके।










