बिहार की राजनीति में यह बात बहुत मशहूर है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ जाने वाले नेताओं का राजनीतिक भविष्य अक्सर अंधकार में डूब जाता है. हाल ही में जेडीयू से निष्कासित होने के बाद बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने साफ कर दिया है कि वे अपनी राजनीतिक सक्रियता बनाए रखेंगे. अब बड़ा सवाल यह है कि क्या अनंत सिंह नीतीश कुमार से अलग होकर अपनी मजबूत सियासी जमीन बचा पाएंगे या फिर वे भी पुराने बागी नेताओं की तरह असफल हो जाएंगे?
जेडीयू के इतिहास पर नजर डालें तो नीतीश कुमार के खिलाफ बगावत करने वाले बड़े-बड़े नेता समय के साथ हाशिए पर चले गए. शरद यादव, आरसीपी सिंह, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी जैसे दिग्गज इसका जीता-जागता उदाहरण हैं. एमएलसी चुनाव के दौरान पार्टी लाइन के खिलाफ जाने के चलते अनंत सिंह को छह साल के लिए जेडीयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है, जिसके बाद सूबे की सियासत में हलचल तेज हो गई है.
बिहार के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि नीतीश कुमार का साथ छोड़ने के बाद जॉर्ज फर्नांडिस, शरद यादव, दिग्विजय सिंह और अली अनवर जैसे कद्दावर नेता भी अपना जनाधार खो बैठे थे. शरद यादव दोबारा कभी संसद नहीं पहुंच सके, वहीं उपेंद्र कुशवाहा को भी बार-बार दल बदलकर अपनी राजनीतिक जमीन तलाशनी पड़ी. इन नेताओं का असर धीरे-धीरे पूरी तरह से सिमट गया था.
हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अनंत सिंह का मामला इन तमाम नेताओं से काफी अलग है. शरद यादव या आरसीपी सिंह के पास उस तरह का व्यक्तिगत पॉकेट वोट नहीं था जैसा अनंत सिंह का मोकामा क्षेत्र में माना जाता है. अनंत सिंह ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर भी शानदार जीत दर्ज की है और मोकामा की जनता के बीच उनका प्रभाव पार्टीगत सीमाओं से कहीं ऊपर है.
भले ही मोकामा बेल्ट और भूमिहार समाज के बीच अनंत सिंह की पकड़ बेहद मजबूत है, लेकिन प्रदेश स्तर पर अकेले दम पर एनडीए गठबंधन का मुकाबला करना उनके लिए आसान नहीं होगा. इसके बावजूद, उनके निजी वर्चस्व को देखते हुए यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ‘छोटे सरकार’ उपर्युक्त नेताओं के फेल होने वाले पैटर्न को तोड़कर बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय लिख पाते हैं या नहीं.










