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West Bengal: अभिषेक बनर्जी पर बढ़ा दबाव: बागी विधायकों ने नेतृत्व स्वीकारने से किया इनकार, घमंड और भाई-भतीजावाद के लगे आरोप

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West Bengal: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी में ममता बनर्जी के बाद दूसरे सबसे प्रभावशाली नेता माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी को अब जनता के साथ-साथ अपनी ही पार्टी के नेताओं और विधायकों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि बगावत करने वाले 58 विधायकों ने अपने गुट में अभिषेक बनर्जी को किसी भी भूमिका में स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।

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बागी विधायकों का स्पष्ट संदेश

बागी खेमे से जुड़े एक नेता ने कहा कि वे ममता बनर्जी को अपना नेता मानते हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी को स्वीकार नहीं करते। दिलचस्प बात यह है कि बागी विधायकों ने सीधे तौर पर ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती नहीं दी है।

विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए पत्र में भी उन्होंने ममता बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में मान्यता देना जारी रखा, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि विधायक दल के कामकाज में अभिषेक बनर्जी के अधिकार को वे अब स्वीकार नहीं करेंगे।

घमंड और भाई-भतीजावाद के आरोप

चुनाव परिणाम आने के बाद टीएमसी के एक विधायक ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए गंभीर आरोप लगाए थे। डेक्कन क्रॉनिकल की एक रिपोर्ट के अनुसार, विधायक ने कहा था कि “ताकत का अहंकार” और “व्यापक भाई-भतीजावाद” ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी ने चुनावी रणनीतिकार संस्था आई-पैक के साथ मिलकर पार्टी के पुराने और जमीनी कार्यकर्ताओं को हाशिए पर पहुंचा दिया, जिससे संगठन के भीतर असंतोष बढ़ा।

पुराने नेताओं के हाशिए पर जाने से बढ़ी नाराजगी

रिपोर्ट के मुताबिक, टीएमसी के कई नेताओं का मानना है कि ममता बनर्जी का अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी पर अत्यधिक भरोसा पार्टी में आंतरिक मतभेदों की एक बड़ी वजह बना। नेताओं का कहना है कि जिस दौर में अभिषेक बनर्जी का प्रभाव तेजी से बढ़ा, उसी समय वरिष्ठ नेता मुकुल रॉय को संगठन में धीरे-धीरे किनारे किया गया।

पार्टी के पुराने नेताओं के बीच यह धारणा बनी कि संगठन में उनके अनुभव और योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। इसी कारण असंतोष की भावना लगातार मजबूत होती गई।

शुभेंदु अधिकारी के साथ भी बढ़ा था टकराव

पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका को लेकर शुभेंदु अधिकारी के साथ भी मतभेदों की चर्चा रही है। एक टीएमसी नेता के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी उस समय तृणमूल यूथ कांग्रेस के प्रमुख थे और मालदा, मुर्शिदाबाद समेत कई क्षेत्रों में उनका मजबूत प्रभाव था।

बताया जाता है कि तनाव तब बढ़ा जब अभिषेक बनर्जी ने पार्टी के भीतर अपनी अलग युवा टीम तैयार करनी शुरू की। बाद में जब यह मामला ममता बनर्जी तक पहुंचा तो उन्होंने शुभेंदु अधिकारी को हटाकर अभिषेक बनर्जी को युवा संगठन की कमान सौंप दी। इसे अधिकारी की नाराजगी की एक बड़ी वजह माना जाता है।

फलता सीट पर हार से भी उठे सवाल

टीएमसी के गढ़ माने जाने वाले फलता विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की हार ने भी अभिषेक बनर्जी की रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। यह क्षेत्र उनके संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है और यहां के प्रभावशाली नेता जहांगीर खान को उनका करीबी माना जाता रहा है।

चुनाव के दौरान मतदान से ठीक एक दिन पहले जहांगीर खान ने अपना नामांकन वापस ले लिया था। इसके बाद यह सीट भारतीय जनता पार्टी के खाते में चली गई। हालांकि टीएमसी ने इसे जहांगीर खान का निजी फैसला बताया था, लेकिन पार्टी के भीतर इस बात को लेकर नाराजगी बनी रही कि नाम वापस लेने के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

पार्टी के भीतर बढ़ती चुनौती

4 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ असंतोष लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। बागी विधायकों का रुख यह संकेत देता है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक भूमिका को लेकर गंभीर मतभेद मौजूद हैं। हालांकि ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती नहीं दी गई है, लेकिन अभिषेक बनर्जी को लेकर उठ रहे सवाल और आरोप टीएमसी के भीतर चल रहे राजनीतिक संघर्ष को उजागर कर रहे हैं।

Shivam Verma
Author: Shivam Verma

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