Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और सौरभ भारद्वाज समेत छह AAP नेताओं के खिलाफ अदालत की आपराधिक अवमानना मामले में सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया है। अदालत ने सभी नेताओं को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई अब 4 अगस्त को होगी।
यह मामला जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ कथित तौर पर “मानहानिकारक और अपमानजनक” टिप्पणियां किए जाने से जुड़ा है। सुनवाई जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच के समक्ष हुई।
अदालत ने सोशल मीडिया रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के दिए निर्देश
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि अवमानना की कार्यवाही 14 मई को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा द्वारा पारित आदेश के आधार पर शुरू की गई थी। अदालत ने बताया कि सोशल मीडिया पोस्ट, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और प्रकाशित सामग्री को इस मामले का आधार बनाया गया है।
कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिए कि संबंधित सभी पोस्ट और रिकॉर्ड की प्रतियां सुरक्षित रखी जाएं और उन्हें अदालत के समक्ष पेश किया जाए। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि मामले में सहायता के लिए एक एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) नियुक्त किया जाएगा।
14 मई को शुरू हुई थी अवमानना की कार्यवाही
इससे पहले 14 मई को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी के छह नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया था।
पिछली सुनवाई में अदालत ने कहा था कि नेताओं द्वारा कोर्ट और जज को लेकर की गई कुछ टिप्पणियां न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ और अवमाननापूर्ण प्रतीत होती हैं। अदालत ने विशेष रूप से संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज और विनय मिश्रा के बयानों का उल्लेख करते हुए उन्हें गंभीर माना था।
गौरतलब है कि सौरभ भारद्वाज और विनय मिश्रा शराब घोटाले के आरोपी नहीं हैं, इसके बावजूद अदालत की टिप्पणी के चलते वे भी इस कार्रवाई के दायरे में आ गए।
जस्टिस शर्मा ने स्वतः संज्ञान लेने की कही थी बात
पिछले सप्ताह सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा था कि आबकारी नीति मामले के कुछ आरोपियों द्वारा उनके खिलाफ “बेहद अपमानजनक, मानहानिकारक और अदालत की अवमानना” वाली सामग्री पोस्ट की गई है। उन्होंने कहा था कि वह इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए अवमानना कार्यवाही शुरू करेंगी।
यह टिप्पणी उस समय सामने आई थी, जब अदालत अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और पूर्व विधायक दुर्गेश पाठक की ओर से अदालत की सहायता के लिए तीन वरिष्ठ वकीलों को एमिकस क्यूरी नियुक्त करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही थी। तीनों नेताओं ने पहले खुद को अदालत में कानूनी रूप से अप्रतिनिधित्वित रखने का फैसला किया था।
“मैं इस पर चुप नहीं रह सकती” — जस्टिस शर्मा
सुनवाई के दौरान जस्टिस शर्मा ने कहा था कि कुछ प्रतिवादियों द्वारा उनके और अदालत के खिलाफ अत्यंत अपमानजनक और अवमाननापूर्ण सामग्री पोस्ट की जा रही है। उन्होंने कहा, “मैं इस पर चुप नहीं रह सकती।”
दरअसल, जस्टिस शर्मा सीबीआई की उस पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रही थीं, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा फरवरी में आबकारी नीति मामले में 23 आरोपियों को डिस्चार्ज किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है।
जज शर्मा की अदालत का बहिष्कार करने की घोषणा
इससे पहले अप्रैल में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने कथित तौर पर जस्टिस शर्मा को पत्र भेजकर सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे अदालत में अपना पक्ष रखने के लिए कोई वकील नियुक्त नहीं करेंगे। उन्होंने इस कदम को “सत्याग्रह” बताया था।
तीनों नेताओं ने जस्टिस शर्मा के कथित तौर पर आरएसएस से जुड़े विधिक संगठन ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद’ से संबंधों पर सवाल उठाए थे। AAP नेताओं का कहना था कि उनकी पार्टी वैचारिक रूप से इस संगठन का विरोध करती है।
निष्पक्षता को लेकर भी उठाए गए सवाल
AAP नेताओं ने यह आशंका भी जताई थी कि यदि जस्टिस शर्मा इस मामले की सुनवाई करती हैं तो निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। उनका दावा था कि जस्टिस शर्मा के बच्चे केंद्र सरकार के पैनल में अधिवक्ता हैं और उन्हें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर से मामले सौंपे जाते हैं। तुषार मेहता इस आबकारी नीति मामले में हाई कोर्ट में CBI की ओर से पेश हो रहे हैं।
इससे पहले अरविंद केजरीवाल और पांच अन्य आरोपियों ने जस्टिस शर्मा से खुद को मामले की सुनवाई से अलग करने की मांग भी की थी। केजरीवाल ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर यह गुजारिश की थी। याचिका खारिज होने के बाद उन्होंने खुद वकील बनकर जस्टिस शर्मा की अदालत में जिरह की थी।
हालांकि अदालत ने यह मांग ठुकरा दी थी और आरोपियों द्वारा लगाए गए “संकेतों, आरोपों और संदेहों” पर कड़ी आपत्ति जताई थी।
Author: Shivam Verma
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